Saturday, 6 July 2019

निंदा और आत्मश्लाघा

निंदा और आत्मश्लाघा में कोई अंतर नहीं होता ।
जब कोई आप की प्रशंसा करता है तो अहंकार को अत्यंत तोष का अनुभव होता है । थोड़ी देर के लिये आप आनंदातिरेक में चले जाते हैं । किंतु अपनी प्रशंसा सुनने का अवसर बहुत लंबे समय तक नहीं मिल पाता । चाटुकार कोशिश करते हैं कि आप में कोई ऐसा गुण खोज लें किंतु कई बार अच्छे से अच्छा चाटुकार भी आप में कोई प्रशंसा योग्य गुण नहीं खोज पाता । ऐसे में परनिंदा अत्यंत सहायक सिद्ध होती है ।
परनिंदा अत्यंत सरस होती है । दूर से भी कान में पड़ जाये तो कान खड़े हो जाते हैं । निंदा की तात्कालिक प्रतिक्रिया अंतश्चेतना पर दो तरह की होती है । एक तो यदि वह दुर्गुण आप के अंदर है तो आप को संतोष होता है कि आप अकेले दुर्गुणी नहीं हैं आप जैसा एक और मिला । आप स्वयं किये हुये पापों की आत्मग्लानि से मुक्त हो जाते हैं । दूसरा यह कि यदि वह दुर्गुण आप में नहीं है तो हृदय में अलग तरह की श्रेष्ठता का भाव उत्पन्न होता है । प्रशंसा सुनने को तरसता आप का मन एक पल को अपने ऊपर ही मुग्ध हो जाता है । आप और रुचि पूर्वक निंदा सुनने लगते हैं । धीरे धीरे आप स्वयं भी निंदा करने के जाल में फँस जाते हैं ।
किसी की निंदा में जितनी जल्दी विश्वास उत्पन्न होता है रस उत्पन्न होता है प्रशंसा में उसके एकदम पलट स्थिति होती है । किसी की प्रशंसा में इतनी जल्दी रूचि उत्पन्न नहीं होती । कोई इतना अच्छा कैसे हो सकता है, निश्चित रूप से पाखंडी है , जैसे तमाम प्रश्न मन में घुमड़ने लगते हैं । प्रशंसा तो केवल ईश्वर की ही हो सकती है । 
कोई आप के अवगुणों के बारे में जाने या न जाने मगर आप तो जानते ही हैं । लगभग यही धारणा लोग दूसरों के बारे में रखते हैं । इसीलिये दूसरे की प्रशंसा आसानी से हजम नहीं होती । इसमें थोड़ी बहुत देर ही रस आ सकता है । निंदा में अनंत रस है । पूरी रात बैठ कर निंदा की जा सकती है !
तुलसी के समय से अब तक मानव मनोविज्ञान में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है ।
जहँ कहुँ निंदा सुऩहिं पराई ! हरषहिं मनहुँ परी निधि पाई !!
जो काहू की सुनहिं बड़ाई ! स्वास लेहिं जिमि जूड़ी आई !!
राजकमल गोस्वामी

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