महाराजा रणजीत सिंह ४० वर्ष पूरे पंजाब में एकछत्र राज्य कर के १८३९ में दिवंगत हो गये और उनके बाद उत्तराधिकार के लिये दरबार में फूट पड़ गई । अंग्रेजों ने इसका लाभ उठा कर १८४५ और १८४९ के दो युद्धों में दुर्जेय सिखों को पराजित कर पंजाब पर कब्जा कर लिया । नादिरशाह द्वारा लूटा हुआ कोहिनूर महाराजा रणजीत सिंह ने नादिरशाह के उत्तराधिकारी शुजा शाह से छीना था , वह अंग्रेजों के कब्जे में आ गया जिसे एक भव्य समारोह में रानी विक्टोरिया को भेंट किया गया । महाराजा के अवयस्क पुत्र दलीप सिंह को ईसाई बना कर लंदन भेज दिया गया और वहीं उनकी परवरिश हुई ।
दलीप सिंह जवान हो कर जब भारत लौटे तो अदन में ही उन्होंने दुबारा सिख धर्म स्वीकार कर लिया । पंजाब में १८७० के आस पास सिखों ने सिंह सभा का गठन किया जो मुख्य रूप से धर्म परिवर्तन को रोकती थी ।
रणजीत सिंह जी ने गुरुद्वारों को बहुत सारी ज़मीन दे रखी थी । अकेले ननकाना साहब के गुरुद्वारे के पास १७००० एकड़ जमीन थी और एक लाख रुपये मालगुज़ारी आती थी । अंग्रेजों ने इन गुरुद्वारों पर महंतो के माध्यम से नियंत्रण स्थापित कर रखा था ।
रणजीत सिंह जी ने गुरुद्वारों को बहुत सारी ज़मीन दे रखी थी । अकेले ननकाना साहब के गुरुद्वारे के पास १७००० एकड़ जमीन थी और एक लाख रुपये मालगुज़ारी आती थी । अंग्रेजों ने इन गुरुद्वारों पर महंतो के माध्यम से नियंत्रण स्थापित कर रखा था ।
१९२० के आस पास सिंह सभा ने करतार सिंह झब्बर के नतृत्व मे अकाली मूवमेंट शुरू कर इन गुरुद्वारों को एक छत के नीचे लाने के लिये कोशिश शुरू कर दी । यह आंदोलन स्यालकोट के गुरुद्वारे से शुरू हुआ और अमृतसर में हरमंदिर साहब पर नियंत्रण स्थापित करने के साथ ही पूरे पंजाब में फैल गया ।
लेकिन ननकाना साहब के गुरुद्वारे के महंत के पास अपने सैनिक भी थे । जिसने २० फरवरी १९२१ को इन शांतिपूर्ण आंदोलन कारियों पर गोली चलवा दी और कम से कम २०० आंदोलनकारियों की गुरुद्वारे के अंदर घेर कर हत्या कर दी । कई गोलियाँ गुरुग्रंथ साहब को भी लगीं ।
ननकाना साहब नरसंहार जलियाँवाला बाग से भी अधिक हृदयद्रावी था । अंग्रेज अफसरों ने सब कुछ जानते हुए भी उपद्रव को रोकने के कोई उपाय नहीं किये । महात्मा गाँधी स्वयं ननकाना साहब पहुचे । यद्यपि ननकाना साहब इस घटना के बाद सिंह सभा के कब्जे में दे दिया गया लेकिन शेष गुरुद्वारों के लिये सिखों ने आंदोलन छेड़ दिया । गाँधी जी ने ननकाना साहब हत्याकांड में आंदोलनकारियों द्वारा अहिंसा के पालन की मुक्तकंठ से प्रशंसा की और इस आंदोलन को काँग्रेस का समर्थन प्रदान किया । ब्रिटिश सरकार पंजाब असेंबली में गुरुद्वारा बिल ले कर आई मगर उसमें कमेटी में सरकारी प्रतिनिधियों को रखने की बात पर सिख और नाराज़ हो गये । इसके साथ ही यह आंदोलन जोर पकड़ गया , लगभग ३०००० आंदोलनकारी जिस मे सिख हिंदू सभी शामिल थे गिरफ्तार हुए ।
अंततः सरकार को झुकना पड़ा और १९२५ मे क़ानून बना कर सभी ऐतिहासिक गुरुद्वारा शिरोमणि गुरुद्वारे प्रबंधक कमेटी को सौंप दिये गये ।
अंततः सरकार को झुकना पड़ा और १९२५ मे क़ानून बना कर सभी ऐतिहासिक गुरुद्वारा शिरोमणि गुरुद्वारे प्रबंधक कमेटी को सौंप दिये गये ।
इस तरह के आंदोलन और कुछ करें न करें किंतु सामूहिक आत्मविश्वास और महत्वाकांक्षा जरूर विकसित करते हैं । ख़लाफत आंदोलन ने मुसलमानों को और अकाली आंदोलन नें सिखों को आत्मविश्वास से लबरेज़ कर दिया ।
असहयोग आंदोलन भले ही गाँधी ने वापस ले लिया हो किंतु देश भर में यह विश्वास घर कर गया कि अंग्रेज अब जाने वाले हैं
राजकमल गोस्वामी
No comments:
Post a Comment