Saturday, 6 July 2019

सोरठा

दोहा के एकदम उलट सोरठा एक अतुकांत छंद होता है । दोहा की एक पंक्ति में १३ और ११ मात्रायें होती हैं जबकि सोरठा में ११ और १३ । किसी भी दोहे को सोरठा में परिवर्तित किया जा सकता है । दोहा बहुत लोकप्रिय छंद है मगर सोरठा बहुत प्रभाव उत्पन्न करने वाला छंद है । महत्वपूर्ण अवसरों पर सोरठा को प्राथमिकता दी जाती है ।
तुलसी ने तो रामचरित मानस में सोरठा का अद्भुत उपयोग किया है जैसे वह घटना विशेष को रेखांकित कर रहे हों ।
पहले सम्राट अकबर का सोरठा देखिये जो बीरबल की मृत्यु का समाचार मिलने पर बरबस उनके मुख से निकला था,
दीन देखि सब दीन, एक न दीनो दुसह दुख !
सो अब हम कहँ दीन, कछु नहि राखो बीरवर !!
तुलसी ने तो मानस के मंगलाचरण में ही सोरठों की झड़ी लगा दी है जो सारे के सारे भक्ति रस से ओत प्रोत हैं । किंतु गुरुवंदना का यह सोरठा अद्भुत है और गुरु के प्रति श्रद्धांजलि देता हुआ सा प्रतीत होता है,
बंदउँ गुरु पद कंज, कृपा सिंधु नर रूप हरि !
महा मोह तम पुंज, जासु वचन रवि कर निकर !!
इसी सोरठे में उनके गुरु नरहरि दास का नाम भी संकेतित है ।
गौरी पूजा पर आशीर्वाद प्राप्त करने के बाद सीता की प्रसन्नता का वर्णन देखिये 
जानि गौरि अनुकूल, सिय हिय हरष न जाइ कहि !
मंजुल मंगल मूल, वाम अंग फरकन लगे !!
इसी प्रकार केवट के नाटकीय संवादों पर राम की प्रतिक्रिया भी बहुत सहज भाव में व्यक्त की गई है ।
सुनि केवट के बैन, प्रेम लपेटे अटपटे !
बिहँसे करुना ऐन, चितइ जानकी लखन तन !
शिव स्तुति में किष्किंधा कांड का यह सोरठा दृष्टव्य है ,
जरत सकल सुर वृंद विषम गरल जेहिं पान किय !
तेहि न भजसि मन मंद को कृपाल संकर सरिस !!
सुंदर कांड में यह सोरठा दृश्य को जीवंत बना देता है
कपि करि हृदय विचार, दीन्हिं मुद्रिका डारि तब !
जिमि असोक अंगार दीन्हि हरषि उठि कर गहेउ !!
मंदोदरी रावण को समझा समझा कर हार गई मगर रावण पर कोई असर नहीं हुआ । मूर्खों से उलझने वालों के लिये तुलसी का यह सोरठा मार्गदर्शक है ,
फूलइँ फलइँ न बेंत जदपि सुधा बरसहिं जलद !
मूरख हृदय न चेत जो गुरु मिलहिं बिरंचि सम !!
लक्ष्मण मूर्छित पड़े हैं, हनुमान संजीवनी लाने गये हैं, राम भ्रातृ विछोह मे अत्यंत दुखी हो कर प्रलाप कर रहे हैं । इस सोरठा में तुलसी की काव्य कला अपने उत्कर्ष पर दीख पड़ती है । विलक्षण प्रतिभा के धनी कवि ने उत्प्रेक्षा अलंकार का सुंदर उदाहरण प्रस्तुत किया है,
प्रभु प्रलाप सुनि कान, भये बिकल वानर निकर !
आइ गयउ हनुमान, जिमि करुणा महँ वीर रस !!
आधुनिक काव्य में दोहा भले सुनने को मिल जाये किन्तु सोरठा जैसा छंद अब विलुप्त हो गया है ।
राजकमल गोस्वामी

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