मैं भाग्यशाली हूँ कि मैं नैनीताल तब गया हूँ जब झील का जल नीला हुआ करता था और इतना पारदर्शी था कि एक दो फुट की गहराई तक साफ दिखता था । नौकुचिया ताल के आस पास कहीं कोई निर्माण नहीं था , उस हरीतिमा में असीम शांति का अनुभव होता था । सन ८३ में जब मैंने गोमुख की यात्रा की थी तब भोजवासा में भोज के इतने वृक्ष थे कि थोड़े बहुत भोजपत्र आप स्मृतिचिह्न के रूप में ले जा सकते थे । तब उत्तर काशी से टिहरी के बीच में सुरंगे बनाई जा रही थीं और टिहरी तब तक एक जीवंत शहर था जिसमें राजमहल था , भिलंगना नदी वहाँ भागीरथी से मिलती थी । भिलंगना के किनारे किनारे चलते हुए अति सुंदर खटलिंग ग्लेशियर तक जाया जा सकता था ।
गोमुख पर तब सुंदर सा स्नाउट बना था जिसके अंदर और बाहर बर्फ के शिलाखंड बिखरे हुए थे । गोमुख के ऊपर धूसर रंग की बर्फ जमी हुई थी , बाईं ओर स्टोन फालिंग ज़ोन के बीच से निकलते हुए रास्ता तपोवन को जाता था । ऊपर भागीरथी और शिवलिंग जैसे शिखर थे ।गंगोत्री ग्लेशियर के ऊपर से चलते हुए पर्वतारोही कालिंदी खाल पार कर के बदरीनाथ निकल जाते थे ।
मुझे रूपकुंड की एक असफल यात्रा का सौभाग्य भी प्राप्त है जब हमारा दल बैंदनी बुग्याल से अगले पड़ाव बग्घूबासा तक बर्फ के तूफान और खराब मौसम के कारण नहीं पहुँच सका ।
लेकिन वह अस्सी और नब्बे का दशक था । उत्तराखंड राज्य का निर्माण नहीं हुआ था । विकास रूपी राक्षस के पंजे उस पर नहीं पड़े थे । चार धाम यात्राओं का धार्मिक स्वरूप और आस्था विद्यमान थी । केदारनाथ के पीछे शंकराचार्य की समाधि देख कर चेतना ही समाधिस्थ हो जाती थी यह सोच कर कि कैसे केरल का एक युवा सन्यासी इतने दुर्गम पर्वतों वनों और अगम नदी घाटियों को पार कर यहाँ आया होगा ।
अब तो शंकराचार्य की समाधि भी नहीं रही , नैनी झील का पानी काला हो गया , नौकुचिया पर फ्लैट बन गये , टिहरी डूबे हुए दस साल से ऊपर हो गये । पहाड़ जाता हूँ तो मन खिन्न हो जाता है । प्राकृतिक सौंदर्य समाप्त हो गया है । फाइव स्टार कल्चर ने सब कुछ लील लिया वरना सोनप्रयाग के किनारे बैठ कर बिसलरी का पानी पीने का विचार भी मन में नहीं आ सकता था । अलकनंदा की धार बदरीनाथ में इतनी स्वच्छ पारदर्शी और गतिशील होती थी कि लगता था बर्फ की शिला सरकती हुई जा रही हो ।
बहुत दुख हुआ पढ़ कर कि पहाड़ों में सड़कें जाम हो गई हैं, पेट्रोल पंपों में पेट्रोल समाप्त हो गया है , एटीएम पैसे से खाली हो गये हैं ।
उत्तराखंड के पहाड़ प्लेज़र ट्रिप के लिये नहीं हैं । अस्ति उत्तरास्याम दिशि देवतात्मा हिमालयो नाम नगाधिराज:। हिमालय एक जीता जागता देवता है । लोग हनीमून के लिये केदारनाथ जाने लगे हैं तो हिमालय का कोपभाजन भी बनेंगे । हिमालय एक नाजुक पहाड़ है , भूस्खलन रोज़मर्रा की बात है । पहले लोग चार धाम यात्रा पर जाते थे तो अपना श्राद्ध का सामान निकाल कर रख जाते थे, जीवित लौट आते थे तो बड़ा भंडारा करते थे ।अब जिसे देखो गाड़ी उठा कर चल देता है । अलग राज्य बन गया है तो उत्तराखंड को राजस्व भी चाहिये । पैसे की यह हवस पहाड़ों को खा जायेगी ।
शिवलिंग पर्वत पर सूर्यास्त

No comments:
Post a Comment