Saturday, 6 July 2019

आर्म्स एक्ट १८७८

८५७ के स्वातंत्र्य युद्ध का जो सबसे बड़ा और दूरगामी दुष्परिणाम हुआ वह यह कि अंग्रेजों ने भारत में आर्म्स एक्ट १८७८ लागू कर दिया और एक झटके में सम्पूर्ण भारत वर्ष को निःशस्त्र कर दिया । अब कोई बिना लाइसेस हथियार नहीं रख सकता था । सशस्त्र क्राँति की सारी संभावनायें इसी के साथ समाप्त हो गईं ।
"बर्छी तीर कृपाण कटारी उसकी यही सहेली थीं" अतीत की बात हो गई । शस्त्र संचालन मे भारतवासी निपुण थे और कोई भी व्यक्ति बंदूक से ले कर तोप तक रख सकता था । लेकिन अब भारतीयों को लाइसेंस मिलना लगभग असंभव बना दिया गया । तलवार, कटार, गुप्ती, लंबे ब्लेड वाले चाकू सब प्रतिबंधित हो गये । केवल सिखों को तलवार/ कृपाण और गुरखा को खुकरी रखने की अनुमति थी वह भी कभी भी ज़ब्त कराई जा सकती थी ।
इन प्रतिबंधों का सबसे बुरा असर सभ्य समाज पर पड़ा । एक बस में एक लुटेरा एक पिस्तौल दिखा कर सबको लूट लेता है । यदि बस में सभी सशस्त्र हों तो इस तरह की लूट संभव नहीं है । असामाजिक तत्वों के हौसले बढ़ गये और सभ्य लोग धीरे धीरे बुज़दिल होते चले गये ।
सशस्त्र समाज में सदैव लोग एक दूसरे से सभ्यता से पेश आते हैं ।
अफसोस है कि यह क़ानून आज़ादी के बाद भी उसी शिद्दत से लागू है । एक तरफ तो सरकार सुरक्षा दे नहीं पाती है दूसरी तरफ न हथियारों की तस्करी रोक पाती है और न जनता को आत्मरक्षा के लिये हथियार रखने देती है । यह जो बंगाल में हो रहा है या जहाँ देखो हो जाता है यह तब संभव ही नहीं था । सशस्त्र लोगों के मुहल्लों को यूँ जलाया नहीं जा सकता । ग़ैरक़ानूनी हथियार रखने वालों को खुली छूट दे कर निहत्थी जनता को मरने के लिये छोड़ दिया गया है ।
दुनिया के अनेक देशों में लाइसेंस प्रणाली नहीं है । आत्मरक्षा मनुष्य का मूलभूत अधिकार है । वहाँ कभी दंगे नहीं होते ।
राजकमल गोस्वामी

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