Saturday, 6 July 2019

इस्लाम और सियासत

भारत में इस्लामी राज्य एक अलग तरह का शासन लेकर आया । इससे पूर्व भी राजाओं में युद्ध होते थे किंतु सामान्य जनता का बहुत बड़ा वर्ग अप्रभावित रहता था ।" कोउ नृप होइ हमै का हानी, चेरी छोड़ि न होउब रानी " वाली मनोवृत्ति थी ।
किंतु इस्लाम ने ग़ैर मुस्लिम प्रजा को मृत्यु, धर्म परिवर्तन और जज़िया में से एक चुनने का विकल्प दिया ।
भारत की सभ्यता और संस्कृति अरब और ईरान दोनों से बहुत उच्च कोटि की थी सामाजिक विषमतायें थीं मगर फिर इस्लाम की दास प्रथा से बुरी स्थिति नहीं थी । मध्यकाल के इस्लामी शासन में लाखों हिन्दू स्त्री पुरुषों को गुलाम बना कर मध्येशिया की मंडियों में बेचा गया ।
ईरान ईराक़ व उत्तरी अफ्रीका की तरह भारत ने इस्लाम के समक्ष आत्मसमर्पण नहीं कर दिया । राजपूताना ने तो अपनी आन बान शान की रक्षा के लिये जौहर और शाका जैसी प्राणोत्सर्ग कर के भी धर्म रक्षा की परंपरायें शुरू कीं । राजपूतों को साथ लिये बिना भारत में इस्लाम का राज करना दूभर हो गया । विवश हो कर अकबर को जज़िया हटाना पड़ा साथ ही साथ युद्ध में बंदी बनाये गये हिंदू सैनिकों को ग़ुलाम बनाने की इस्लामी सुन्नत को भी त्यागना पड़ा ।
अकबर से लेकर औरंगजेब के आते आते हिंदू मुसलमानों में काफी कुछ सद्भाव विकसित हो गया । दरबारों में हिंदुओं की पैठ हो गई । अपनी आर्थिक आधार पर विकसित जाति प्रथा के कारण हिंदू बहुत सी कलाओं में प्रवीण थे उसका लाभ राज्य को मिलने लगा ।
मगर औरंगजेब ने सब गुड़ गोबर कर दिया । अपने पापों को ढकने के लिये उसे मुल्लाओं के साथ की जरूरत थी अतः वह कट्टरपंथी हो गया । हिंदुओं के विरुद्ध देश व्यापी जिहाद शुरू हो गया । लगभग १०० वर्षों बाद जज़िया फिर बहाल हो गया । यहाँ तक कि हिंदू भिखारियों के कटोरों से भी जज़िया वसूला जाने लगा ।
हिंदुओं की सोई हुई अस्मिता जाग उठी । उत्तर से दक्षिण तक मुग़ल साम्राज्य की ईंट से ईंट बजा दी गई । सिखों जाटों ने मराठों ने मुगलों की जड़ में मट्ठा डाल दिया और औरंगजेब के बाद ही मुगल साम्राज्य का पतन प्रारंभ हो गया । पानीपत की तीसरी लड़ाई तक मुगल सम्राट मराठों पर आश्रित हो गया था इसीलिये यह लड़ाई मराठों और अब्दाली के बीच हुई ।
पानीपत की लड़ाई ने मुगल और मराठा दोनों ही शक्तियों को कमजोर कर दिया और अंग्रेज जो बंगाल तक सीमित थे उनको हिंदुस्तान पर कब्जा करने का हौसला प्रदान किया १७६४ में बक्सर में उन्होंने मुगलों को हरा दिया ।
भारत में अंग्रेजी शासन आ गया । अंग्रेज लुटेरे थे मगर क़ानून बना कर ही लूटते थे । देश में क़ानून का शासन स्थापित हुआ । उत्तर से दक्षिण तक ठगों और पिडारियों का आतंक समाप्त हुआ । लोकतांत्रिक संस्थाओं का विकास हुआ । इसी बीच यूरोप की औद्योगिक क्रांति ने भारत को पूरी तरह निर्धन करने का मार्ग प्रशस्त कर दिया । भारत के उद्योग धंधे चौपट हो गये । 
मुसलमानों में अपना खोया हुआ साम्राज्य प्राप्त करने के लिये दो धारायें बन गईं एक देवबंद में दारुल उलूम की स्थापना कर ईश्वर की शरण चली गई तो दूसरी ने अलीगढ़ में मुसलमानों को आधुनिक शिक्षा से लैस करने का इरादा किया ।
गाँधी का अभ्युदय एक अद्भुत घटना थी । दक्षिण अफ्रीका में अहिंसा के लगभग सफल प्रयोग के बाद वह भारत आये थे और चंपारन आंदोलन के बाद वह लोकमानस पर छा गये । रौलट एक्ट के विरुद्ध देशव्यापी प्रदर्शनों ने गाँधी का हौसला बढ़ाया और कुछ ही दिनों बाद उन्होंने पूर्ण स्वराज्य के लक्ष्य को सामने रख कर असहयोग आंदोलन प्रारंभ किया । १८५७ के बाद यह अंग्रेजों के विरुद्ध सबसे प्रबल आंदोलन था । छात्रों ने कॉलेज जाना छोड़ दिया , वकीलों ने अदालतों का बहिष्कार कर दिया । सुदूर पहाड़ों में भी मजदूरों और कुलियों ने अंग्रेजों का सामान ढोना छोड़ दिया मगर चौरीचौरा में भीड़ द्वारा एक थाना फूंक दिये जाने मात्र से आहत हो कर गाँधी ने यह आंदोलन वापस ले लिया । पूरा देश निराशा में डूब गया ।
इसी बीच तुर्की में कमाल पाशा ने इस्लाम के सबसे पुराने संस्थान ख़लीफा को उखाड़ फेंका वह मुसलमानों को आधुनिक समय के अनुरूप ढालना चाहता था । मुसलमानों ने कमाल पाशा से स्वयं खलीफा बनने का अनुरोध किया मगर उसने ठुकरा दिया और सभी मुस्लिम रीति रिवाज़ों को आधुनिक बनाने का फैसला किया । तुर्की भाषा की लिपि अरबी से बदल कर रोमन कर दी । यहाँ तक कि देश में अरबी भाषा में अज़ान देने पर भी पाबंदी लगा दी ।
भारत के कठमुल्लों ने ख़लीफ़ा का पद बहाल करने के लिये आंदोलन कर दिया । गाँधी जी ने अंग्रेजों के विरुद्ध मुसलमानों का भी सहयोग मिल जाये इस आशा से ख़िलाफत आंदोलन का समर्थन कर दिया । गाँधी की तमाम सदाशयता के बावजूद यह समर्थन गाँधी के जीवन की सबसे बड़ी भूल थी । यहाँ तक कि जिन्ना ने भी इसका विरोध किया ।
मुसलमानों के सभी आंदोलन एक जैसे होते हैं , अपने आस पास के हिंदुओं को लूट लेना उनके घर जलाना उन पर अत्याचार करना । इस्लाम उन्हें अल्लाह के दुश्मनों से लड़ने की शिक्षा देता है । सबसे भयावह लूट पाट केरल में मालाबार में हुई । इसको मालाबार का दूसरा जिहाद भी कहते हैं । हज़ारों हिंदुओं का धर्मपरिवर्तन किया गया । हिंदू महिलाओ पर अकल्पनीय अत्याचार हुए और गाँधी चुप रहे । वह स्वराज्य के बड़े लक्ष्य के लिये छोटी मोटी बात की उपेक्षा करना चाहते थे । चौरीचौरा भी छोटी घटना थी किंतु वह जानते थे कि आंदोलन अगर हिंसक हो गया तो अंग्रेज उसे १८५७ की तरह निर्ममता से कुचल डालेंगे । मालाबार के हिंदुओं से उन्हें ऐसा कोई ख़तरा न था ।
मगर मालाबार की हिंसा ने हिंदुओं की एक शाखा को गाँधी से अलग कर दिया केशव बलिराम हेडगेवार ने असहयोग आंदोलन में भाग लिया था , अब उन्होंने हिंदुओं को आत्मरक्षार्थ संगठित करने का निर्णय लिया और नागपुर दंगों के बाद राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का गठन किया । 
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने हिंदू राजनीति में एक पृथक अंतर्धारा को जन्म दिया जिसका वर्णन आगे जारी रहेगा !
राजकमल गोस्वामी

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