Saturday, 6 July 2019

नंदा देवी

नंदा देवी एक अद्भुत पर्वत शिखर है । इसके चारों ओर 6000 मीटर से भी ऊँचे पचीस से भी अधिक पर्वत शिखरों का एक प्राकृतिक वृत्त सा बना हुआ है जिसे पार किये बिना कोई नंदा देवी की चढ़ाई शुरू भी नहीं कर सकता । कभी सिक्किम विलय से पूर्व नंदा देवी भारत की सबसे ऊँची पर्वत चोटी थी ।
नंदा देवी और उसके चारों ओर की पर्वत श्रंखलाओं तथा घाटियों को मिला कर जो प्राकृतिक परिवेश निर्मित है उसे नंदादेवी अभयारण्य के नाम से यूनेस्को ने विश्व धरोहर घोषित कर रखा है । अभयारण्य के अंदर से लतागाँव के पास ऋषिगंगा नदी बाहर निकलती है तो अभयारण्य में प्रवेश करने का मार्ग भी वही है । ऋषि गंगा एक बहुत ऊँचे गह्वर से पूरे प्रवाह के साथ नीचे गिरती है और पर्वतारोही को प्रवाह के विपरीत चढ़ते हुए अपना मार्ग बनाना पड़ता है । सबसे पहले नंदा देवी की चढ़ाई इसी मार्ग से हुई थी ।
कभी वर्ष ८५ में पिंडारी ग्लेशियर की ट्रेकिंग की थी जहाँ से पिंडर नदी निकलती है जो कर्णप्रयाग में अलकनंदा में मिल जाती है । हमारे ट्रेकिंग दल का नेतृत्व श्री गोपाल कृष्ण शर्मा कर रहे थे जो एक दिग्गज पर्वतारोही भी हैं जो उस समय तक नंदा देवी के एक अभियान में भाग ले चुके थे तथा बाद में सन ९३ में पुन: नंदा देवी के एक सफल अभियान में भाग लिया । पिंडारी ग्लेशियर के पास ही पँवाली द्वार नाम की चोटी है जो वहाँ से इतनी नज़दीक दिखाई दे रही थी कि जोश में हमने कहा कि इस पर तो हम लोग भी आराम से चढ़ सकते हैं । गोपाल जी हमारे मामा जी हैं उन्होंने पर्वतारोहण की गंभीरता से परिचित कराते हुये मार्ग में एक शिला पर जड़े हुए जापान सरकार के उस ताम्रपत्र पर हमारा ध्यान आकृष्ट कराया जिसमें उन जापानी पर्वतारोहियों के नाम उत्कीर्ण थे जो कुछ ही वर्ष पूर्व पँवाली द्वार पर्वत पर आरोहण के समय आये एवलाँश (बर्फ के तूफान) में अपने प्राण गँवा चुके थे ।
नंदा देवी में कितना आकर्षण है यह महान पर्वतारोही विलियम ( विली)अनसोएल्ड की कहानी से जाना जा सकता है । १९४८ में २२ साल की उम्र में वह नंदा देवी अभियान पर आया था । नंदा देवी के सौंदर्य से अभिभूत हो कर उसने लौट कर विवाह किया और अपनी पुत्री का नाम नंदा देवी रखा । २८ साल बाद सन ७६ में वह फिर से नंदा देवी आया और इस बार उसकी पुत्री नंदा देवी भी उसके साथ थी ।
विली ने स्वयं सन ६३ में एवरेस्ट पर पताका फहराई थी और अपनी पुत्री को बहुत अच्छी तरह पर्वतारोहण में प्रशिक्षित किया था । पुत्री नंदा देवी अभियान में प्रतिभाग कर अभिभूत थी । वह उस चोटी पर चढ़ाई कर रही थी जिसके नाम पर उसका नाम रखा गया था ।
लेकिन उसने वही गलती की जिसके मोह से बड़े से बड़े अनुभवी पर्वतारोही बच नहीं पाते हैं यानी प्रतिकूल परिस्थितियों में भी अभियान जारी रखना । नियम यही है कि पर्वत शिखर कहीं भागा नहीं जा रहा है । कोई समस्या है तो लौट जाइये और दोबारा आइये ।
नंदा देवी अनसोल्ड के पेट में बेस कैम्प से आगे बढ़ते ही मरोड़ शुरू हो गई थी।लेकिन उसमें अभूतपूर्व उत्साह था , वह अपने मिशन ऑफ लाइफ पर आई थी । अभियान के चौथे पड़ाव तक उसकी तबीयत बहुत बिगड़ गई और नंदा देवी शिखर पर हसरत भरी नजर डाल कर उसने अपने प्राण त्याग दिये । दुखी पिता ने उसे वहीं दफना दिया ।
नंदा देवी लोक गाथाओं की जीवित देवी है । हर बारह वर्ष के अंतर में नंदा जात यात्रा निकलती है जो अपने में अनेक रहस्यों को समेटे है लेकिन उसकी चर्चा फिर कभी । कुल मिला कर नंदा देवी को संसार के पर्वत शिखरों में जो स्थान प्राप्त है वह एवरेस्ट को भी नहीं मिला हुआ है । बीच में कई दशकों तक भारत सरकार नें नंदा देवी के अभियानों परर रोक लगा रखी थी । 
चित्र इंटरनेट से 
१ नंदा देवी शिखर
२. विली और उनकी पुत्री नंदा देवी अनसोल्ड
३ पँवाली द्वार चोटी का विहंगम दृश्य
पुनश्च नंदा देवी अभयारण्य के अंदर पर्वतारोहण पर अब भी प्रतिबंध नहीं हटा है । अभी केवल बाहरी वृत्त की चोटियों पर अभयारण्य में प्रवेश किये बिना बाहर से ही चढ़ने की अनुमति है । नंदा देवी ईस्ट भी ऐसी ही एक चोटी है जहाँ अभी हाल ही में दुर्घटना में कई पर्वतारोहियों को जान गँवानी पड़ी है
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