छ: सात वर्ष की अवस्था रही होगी मेरी जब यूरी गगारिन अंतरिक्ष की यात्रा कर लौटे थे । उस समय तक अंतरिक्ष का बोध तो विकसित ही नहीं हो पाया था तो समझ में ही नहीं आ रहा था कि यह हंगामा आख़िर क्यों बरपा है । पिता जी से , गुरुजन से बड़ी जिज्ञासा के साथ पूछा कि क्या गगारिन चाँद पर हो आया है ? अगर चाँद पर नहीं गया तो हवाई जहाज़ तो रोज़ ही आसमान में उड़ते दिखते हैं आख़िर गगारिन क्या कर के आया है जो इतना शोर मच रहा है । बालसुलभ जिज्ञासा को शान्त करने की गुरुजनों ने बड़ा प्रयास किया पर “समुझि परेउ नहिं बालपन तब अति रहेउँ अचेत” !
धीरे धीरे समझ विकसित हुई कि पृथ्वी के वायुमंडल के बाहर भी आकाश है जहाँ हवाई जहाज़ नहीं अंतरिक्ष यान ही जा सकते हैं और उस आकाश में जाने के लिये एस्केप वेलॉसिटी की जरूरत होती है जो पृथ्वी के लिये लगभग ७ मील प्रति सेकेंड है यानी इस रफ्तार से कोई पत्थर उछाला जाये वह लौट कर धरती पर नहीं गिरेगा अपितु अंतरिक्ष में चला जायेगा और वहीं एक उपग्रह बन कर धरती का चक्कर लगाता रहेगा ।
गगारिन रूसी था तो अमेरिका कहाँ पीछे रहने वाला था । सन ६९ में उसने चाँद पर इंसान को उतार दिया । मानवता के इतिहास में यह बहुत बड़ी घटना थी । मुस्लिम धर्मगुरुओं ने पहले तो यह मानने से ही इन्कार कर दिया कि चाँद पर कोई इंसान गया भी है । बाद में बहुत से लोग यह कहते सुने गये कि नील आर्मस्ट्राँग ने वहाँ कुछ ऐसा देखा कि वह लौट कर इस्लाम पर ईमान ले आये । आर्म्स्ट्राँग इसका खंडन ही करते रहे मगर यह झूठ खूब फैलाया गया ।
अंतरिक्ष की दौड़ में मगर भारत कहाँ था ? जब तक श्रीलंका को टेस्ट दर्जा नहीं मिला था तब तक वहाँ के क्रिकेट प्रेमी भारतीय खिलाड़ियों के बड़े फैन थे मगर अंदर अंदर वह एक बड़ा धमाका करने की तैयारी कर रहा था । भारत स्वतंत्रता के पश्चात उन्मीलित नेत्रों से परमाणु शक्ति के उपयोग और अंतरिक्ष के खुलते द्वारों को उत्सुकतापूर्वक देख रहा था ।
पराधीन युग में भारत ने विज्ञान क् सहारे पश्चिम की आश्चर्यजनक प्रगति देखी थी । इसलिये उसने तय कर लिया था देश को दुनिया के बराबर लाना है तो विज्ञान के अब तक अनछुए क्षेत्रों में प्रवेश करना होगा । गगारिन की यात्रा के कुछ ही समय बाद भारत ने परमाणु शक्ति मंत्रालय के अधीन विक्रम साराभाई के नेतृत्व में इंडियन नेशनल कमिटी फॉर स्पेस रिसर्च ( incospar ) का गठन कर दिया जो सीधे प्रधानमंत्री के प्रति जवाबदेह होती थी । आगे चल कर यही इंकोस्पार सन १९६९ में इसरो बन गया ।
विज्ञान के शोध में यह पता नहीं चलता कि जो शोध आज हो रही है कल उसका क्या उपयोग होगा । १७५२ में जब बेंजामिन फ्रैंकलिन ने पतंग उड़ा कर आकाशीय बिजली को भीगी डोर के माध्यम से चाबी में उतारने का प्रयोग किया था तो उन्हें बिलकुल अनुमान न रहा होगा कि सौ साल बाद थॉमस अल्वा एडीसन बिजली के बल्ब बना कर दुनिया की रातों को जगमग कर देंगे ।
भारत ने अपने अत्यंत सीमित संसाधनों से अंतरिक्ष के क्षेत्र में कदम रखा । अपना पहला उपग्रह आर्यभट हमने सन १९७५ में रूस की मदद से अंतरिक्ष में भेजा था और आज हम सैकड़ों विदेशी उपग्रह अपने पीएसएलवी से भेज चुके हैं। भारतीय वैज्ञानिक मेधा का लोहा दुनिया पहले भी मानती थी । बस भारत की अर्थव्यवस्था को अंग्रेजों ने चूस लिया था । हमारे ही वैज्ञानिक नासा में छाये हुए हैं। हम उतना खर्च करने की सामर्थ्य नहीं रखते जितना पश्चिम अपने वैज्ञानिकों पर कर सकता है ।
बेहद कम बजट में हमारे वैज्ञानिक काम करते रहते हैं । मंगलयान एक अद्भुत उपलब्धि थी । चन्द्रयान दो की सॉफ्टलैंडिंग विफल हो जाने से कुछ निराश होने की बात नहीं है और रोने की तो बिलकुल भी नहीं । एडीसन ने बल्ब का फिलामेंट बनाने के लिये दस हजार असफल प्रयोग किये थे । इसरो को तो दुनिया की कोई मदद भी नहीं है उसके वैज्ञानिक हमेशा घातक विदेशी जासूसों के निशाने पर रहते है ।
अपनी वैज्ञानिक उपलब्धियों पर बहुत ढिंढोरा नहीं पीटना चाहिये विशेष रूप से जब हमारे पड़ोसी हमारी विफलता पर ताली पीटने को तैयार बैठे हों । हमारी किसी से स्पर्धा नहीं है । विज्ञान बड़ी शांति के साथ आगे बढ़ता है और अपने समय का इंतज़ार करता है ।
भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र से जुड़े वैज्ञानिकों को बहुत बहुत बधाइयाँ ।
राजकमल गोस्वामी
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