Saturday, 6 July 2019

आर्म्स एक्ट १८७८

८५७ के स्वातंत्र्य युद्ध का जो सबसे बड़ा और दूरगामी दुष्परिणाम हुआ वह यह कि अंग्रेजों ने भारत में आर्म्स एक्ट १८७८ लागू कर दिया और एक झटके में सम्पूर्ण भारत वर्ष को निःशस्त्र कर दिया । अब कोई बिना लाइसेस हथियार नहीं रख सकता था । सशस्त्र क्राँति की सारी संभावनायें इसी के साथ समाप्त हो गईं ।
"बर्छी तीर कृपाण कटारी उसकी यही सहेली थीं" अतीत की बात हो गई । शस्त्र संचालन मे भारतवासी निपुण थे और कोई भी व्यक्ति बंदूक से ले कर तोप तक रख सकता था । लेकिन अब भारतीयों को लाइसेंस मिलना लगभग असंभव बना दिया गया । तलवार, कटार, गुप्ती, लंबे ब्लेड वाले चाकू सब प्रतिबंधित हो गये । केवल सिखों को तलवार/ कृपाण और गुरखा को खुकरी रखने की अनुमति थी वह भी कभी भी ज़ब्त कराई जा सकती थी ।
इन प्रतिबंधों का सबसे बुरा असर सभ्य समाज पर पड़ा । एक बस में एक लुटेरा एक पिस्तौल दिखा कर सबको लूट लेता है । यदि बस में सभी सशस्त्र हों तो इस तरह की लूट संभव नहीं है । असामाजिक तत्वों के हौसले बढ़ गये और सभ्य लोग धीरे धीरे बुज़दिल होते चले गये ।
सशस्त्र समाज में सदैव लोग एक दूसरे से सभ्यता से पेश आते हैं ।
अफसोस है कि यह क़ानून आज़ादी के बाद भी उसी शिद्दत से लागू है । एक तरफ तो सरकार सुरक्षा दे नहीं पाती है दूसरी तरफ न हथियारों की तस्करी रोक पाती है और न जनता को आत्मरक्षा के लिये हथियार रखने देती है । यह जो बंगाल में हो रहा है या जहाँ देखो हो जाता है यह तब संभव ही नहीं था । सशस्त्र लोगों के मुहल्लों को यूँ जलाया नहीं जा सकता । ग़ैरक़ानूनी हथियार रखने वालों को खुली छूट दे कर निहत्थी जनता को मरने के लिये छोड़ दिया गया है ।
दुनिया के अनेक देशों में लाइसेंस प्रणाली नहीं है । आत्मरक्षा मनुष्य का मूलभूत अधिकार है । वहाँ कभी दंगे नहीं होते ।
राजकमल गोस्वामी

अल्लामा इक़बाल

किस तरह से एक मासूम देशभक्ति की कवितायें लिखने वाला बालक इस्लाम के प्रभाव में आकर मातृभूमि के विभाजन की नींव डाल देता है , इक़बाल इसका उत्कृष्ट उदाहरण हैं । आज पाकिस्तान में उन्हें मुसव्विरे पाकिस्तान, हकीमे उम्मत , मुफ़क्किरे पाकिस्तान और शायरे मशरिक कह कर याद किया जाता है । लेकिन एक दिन लाला हरदयाल ने इक़बाल को गवर्नमेंट कॉलेज लाहौर में एक आयोजन में मुख्य अतिथि के रूप में १९०५ में बुलाया था तब इक़बाल ने अपना अवसर आने पर भाषण देने की बजाय वह तराना सुनाया था जो आज तराना ए हिंदी के नाम से मशहूर है । इसी की पंक्तियाँ हैं
मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना !
हिंदी हैं हम वतन है हिंदोस्ताँ हमारा !!
फौरन ही यह तराना देश की गली गली में मक़बूल हो गया । १८७७ में जन्में इक़बाल १९०५ में आगे की पढ़ाई के लिये इंग्लैंड चले गये और १९०८ में एकदम बदले हुए रूप में लौटे । इक़बाल जैसे धर्म परिवर्तन कर के लौटे हों ! उनके पुराने साथी कवि उन्हें हैरानगी से सुन रहे थे । उनकी कविता पर इस्लाम का रंग चढ़ चुका था अब उन्हें इंसान के दुख दर्द की बजाय सिर्फ और सिर्फ मुसलमान का दुख दर्द दिखाई दे रहा था । इन्हीं दिनों इक़बाल ने अपनी मशहूर नज़्म शिकवा एक आयोजन में पढ़ कर सुनाई । इसमें मुसलमानों के हालात के लिये अल्लाह से बड़ी तानाकशी के साथ शिकायत की गई थी । पहले तो अल्लाह पर मुसलमानों के ढेर सारे एहसान गिनवाये गये कि जब तक मुसलमानों ने तलवार नहीं उठाई तब तक अल्लाह को दुनिया में कोई टके का नहीं पूछता था । इस्लाम के विजेताओं ने सारी दुनिया में अपनी जान की बाज़ी लगा कर अल्लाह की पूजा शुरू करवाई । इतने एहसानों के बाद भी अल्लाह ने मुसलमानों का यह हाल बना रखा है । दूसरी क़ौमों को हूर जैसी ख़ूबसूरत औरतें बख़्शी हैं और मुसलमानों को फ़कत वादा ए हूर का ख़्वाब दिखा रखा है । पूरी कविता पढ़ने लायक है मगर कुछ बंद पेश हैं ।
हमसे पहले था अजब तेरे जहाँ का मंज़र,
कहीं माबूद थे पत्थर , कहीं मस्जूद शजर !
ख़ूगर ए पैकरे महसूस थी इंसाँ की नज़र ,
फिर कोई मानता अनदेखे ख़ुदा को क्यूँ कर !
तुझको मालूम है लेता था कोई नाम तेरा ?
क़ुव्वते बाज़ू ए मुस्लिम ने किया काम तेरा !
बस रहे थे यहीं सलज़ूक भी तूरानी भी,
अहले चीं चीन में ईरान में ईरानी भी ,
पर तेरे नाम पे तलवार उठाई किसने ,
बात जो बिगड़ी हुई थीं वो बनाई किसने ?
चुन चुन कर खरी खोटी सुनाई गई हैं ईश्वर को ,
कभी हम से कभी ग़ैरों से शनासाई है !
बात कहने की नहीं तू भी तो हरजाई है ।
इक़बाल का शिकवा सुन कर मुस्लिम जगत सन्न रह गया कि कोई मुसलमान अपने आराध्य से इतनी बद अख़लाकी से कैसे पेश आ सकता है
मगर जल्दी ही इक़बाल ने अल्लाह का पक्ष सामने रखते हुए जवाबे शिकवा लिखा जिसमें ईश्वर इक़बाल द्वारा लगाये गये सारे आक्षेपों का उत्तर देता है और मुसलमानों की बदहाली के लिये ख़ुद मुसलमानों को जिम्मेदार ठहराता है और कहता है कि रसूल की सारी शिक्षा भूल कर मुसलमान फिरकों में बंट गये हैं । 
फिरकाबंदी है कहीं और कहीं ज़ातें हैं !
क्या ज़माने में पनपने की यही बाते हैं ?
अल्लाह की तरफ से कोई कोताही नहीं है,
कोई क़ाबिल हो तो हम शान कई देते हैं !
ढूंढने वालों को दुनिया भी नई देते हैं ।
और अंत में,
की मुहम्मद से वफ़ा तूने तो हम तेरे हैं,
ये जहाँ चीज़ है क्या लौहो क़लम तेरे हैं!!
जवाबे शिकवा ने मुसलमानों को जैसे सोते से जगा दिया हो । इकबाल मुस्लिम जगत के हीरो हो गये ।
तराना ए हिंदी की जगह अब उन्होंने तराना ए मिल्ली लिखा जिसमें देशप्रेम को बकवास बताते हुए मुसलमानों को समझाया कि सारा संसार ही मुसलमानों का देश है और हिजरत कर के देश छोड़ना पैग़ंबर की सुन्नत है । देश के हर मुसलमान की ज़बान पर यह तराना गूँज उठा,
चीनो अरब हमारा, हिंदोस्ताँ हमारा !
मुस्लिम हैं हम, वतन है सारा जहाँ हमारा !!
नतीजतन हिंदुस्तान का मुसलमान सारी दुनिया के मुसलमानों के साथ अपने को जोड़ कर ख़िलाफत आंदोलन में अपने ही देशवासी हिंदुओं पर काल बन कर टूट पड़ा ।
इक़बाल जब इंगलैंड में थे तभी मुस्लिम लीग में शामिल हो गये । १९३० में इलाहाबाद अधिवेशन में अध्यक्षीय भाषण में उन्होंने पहली बार पंजाब, सिंध, बलूचिस्तान और पख्तूनिस्तान को मिला कर अंग्रेज साम्राज्य के अधीन या स्वतंत्र जैसा भी हो एक अलग मुस्लिम राज्य की मांग की जो कालांतर में चौधरी रहमत अली द्वारा पाकिस्तान की मांग में बदल दी गई । इक़बाल को अंग्रेजों ने सर की उपाधि से नवाज़ा था मगर टैगोर जैसा साहस उन मे नहीं था कि अंग्रेजों का विरोध कर सकें ।
इक़बाल की प्रारंभिक कवितायें हिमाला, नया शिवाला आदि मुझे बहुत प्रिय हैं । इक़बाल के बदले हुए रूप को देख कर आनंद नारायन मुल्ला ने लिखा था ,
हिंदी होने पर नाज़ जिसे कल तक था, हिजाज़ी बन बैठा !
अपनी महफिल का रिंद पुराना आज नमाज़ी बन बैठा !
महफिल में छुपा वह क़ैसे हज़ीं, दीवाना कोई सहरा में नहीं !
पैग़ामे जुनूँ जो लाता था इक़बाल वो अब दुनिया में नहीं !
ऐ मुतरिब तेरे तरानों में अगली सी अब वह बात नहीं !
वह ताज़गी ए तख़यील नहीं बेसाख़्ती ए जज़्बात नहीं !!
संयोग से इक़बाल के पितामह एक कश्मीरी पंडित से मुसलमान हुए थे और आनंद नारायन मुल्ला कश्मीरी पंडित थे । 
आज का कश्मीरी पंडित भी आनंद नारायन मुल्ला की तरह ही अफ़सोसज़दा है !!
राजकमल गोस्वामी

रामानुजन्

यो यो यां यां तनुं भक्तः, श्रद्धयार्चितुमिच्छति !
तस्य तस्याचलां श्रद्धां, तामेव विदधाम्यहम् !!
भगवद्गीता ७ - २१ गीता में भगवान कहते हैं कि मैं भक्त की श्रद्धा उसके इष्टदेव में दृढ़ करता हूँ । 
तुलसी मस्तक तब नवै धनुष बाण लेउ हाथ !
यह श्रद्धा यूँ ही नहीं दृढ़ हो जाती । इष्टदेव मनोकामना पूरी करते हैं, सन्मार्ग पर चलने का अवसर उत्पन्न करते हैं । संकटों में स्मरण करने पर संकट निवारण करते हैं । तब न तिरुपति बाला जी से ले कर गाँव के छोटे से शिवाले तक पर श्रद्धालुओं की भीड़ लगी रहती है । यही भगवान का असली विश्वरूप है ।
श्रीनिवास रामानुजन(१८८७-१९२०) भारत में पिछली कई शताब्दियों में उत्पन्न होने वाले महानतम गणितज्ञ थे और नामगिरी देवी उनकी इष्ट थीं जो दक्षिण में विष्णु की पत्नी लक्ष्मी का रूप मानी जाती हैं । रामानुजन की गणित में इतनी रुचि थी कि गणित के अतिरिक्त वह सभी विषयों में फेल हो जाते थे और बीए तक नहीं कर सके । स्वप्न तक गणितमय थे उनके , नामगिरी देवी आती थीं और स्वप्न में ही कुछ संख्या और सूत्र बोर्ड पर लिख जाती थीं जिन्हें रामानुजन स्मरण कर लेते थे और आगे उन पर शोध करते थे ।
पढ़ाई छूट जाने के कारण उनका जीवन कष्टमय हो गया यद्यपि हाईस्कूल के अंकों के आधार पर छात्रवृत्ति मिल रही थी मगर ११वीं में फेल हो गये । मद्रास पोर्ट ट्रस्ट में छोटी सी नौकरी से गुज़ारा होता था किंतु ख्याति दुनिया भर में फैल गई और इंगलैंड से प्रसिद्ध गणितज्ञ हार्डी का बुलावा आ गया । पत्नी जानकी को यहीं छोड़ना पड़ा । कैंब्रिज में उन्होंने शोध किया और बीए की डिग्री भी प्राप्त की ।
रामानुजन ने अपने छोटे से जीवन मे ३८८० से अधिक गणितीय प्रमेय खोजीं और अभी हमारा विज्ञान इतना उन्नत नहीं हो सका है कि उनके द्वारा खोजे गये सभी सूत्रों को उपयोग में ला सके ।
क्रिस्टल विज्ञान से लेकर ब्रह्मांड के रहस्यों की खोज में रामानुजन के सूत्र काम आते हैं ।
हार्डी उनको अस्पताल में देखने जा रहे थे जिस टैक्सी से वह गये उसका नंबर 1729 था , हार्डी ने कहा यह नंबर बहुत बेकार सा नंबर है कुछ अपशकुन तो नहीं है । रामानुजन बोले यह एक अद्भुत सबसे छोटी संख्या है जो दो घन संख्याओं के योग को दो अलग अलग ढंग से दर्शाती है ।
१×१×१+१२×१२×१२= १७२९
तथा
९×९×९+१०×१०×१०= १७२९
१७२९ संख्या को हार्डी रामानुजन संख्या के नाम से जाना जाता है ।
यह अनायास ही नहीं है कि बेंजामिन नेतनयाहू ने भारत के तमाम महापुरुषों को छोड़ कर श्रीनिवास रामानुजन को भारत की पहचान के रूप में याद किया । भारत ने संसार को शून्य और दशमलव प्रणाली दी है अन्यथा रोमन अंकों में गणित की प्रगति संभव ही न थी ।
राजकमल गोस्वामी

Sunday, 28 May 2017

जवाहर लाल नेहरू भाग २

कल नेहरू को श्रद्धांजलि वाली पोस्ट पर कई मित्रों नें अपने अपने ढंग से विरोध जताया है । यह साबित करता है कि हम सब हार्ड लाइनर हो गये हैं और अपने पूर्वजों के योगदान को अपनी अपनी राजनैतिक विचारधाराओं से जोड़ कर देखने लगे हैं और निष्पक्ष मूल्यांकन हमारे पूर्वाग्रहों के कारण दूषित हो जा रहा है ।
नेहरू ने अपने राजनैतिक जीवन में दस साल से कुछ ही कम समय जेल में बिताया था जो सावरकर के दस वर्ष के कालापानी से थोड़ा सा कम था और गाँधी के दक्षिण अफ्रीका और भारत मे बिताये कुल जेल अवधि से तीन वर्ष अधिक था । गाँधी को तब भी आग़ा खाँ पैलेस में बहुत सुविधायें प्राप्त थीं जबकि नेहरू सामान्य राजनैतिक क़ैदी की तरह ही बंद किये गये थे ।

नेहरू के व्यक्तिगत जीवन को कलंकित करने वालों को सोचना चाहिये कि जहाँ पुत्र की चाहत में कई कई विवाह करने वाले आज भी मौजूद हैं , नेहरू एक पुत्री से ही संतुष्ट थे । जब वह विधुर हुए थे तो मात्र ४६ वर्ष के थे और सलमान खान से कहीं अधिक लोकप्रिय थे । माता पिता की अनुपस्थिति के कारण इंदिरा की शिक्षा दीक्षा भी ठीक से न हो सकी फिर भी जेल में रह कर एक पिता का दायित्व कैसे निभाया जाता है यह नेहरू से सीखना चाहिये । जेल में लिखी हुई उनकी पुस्तकें भारत एक खोज, पिता के पत्र पुत्री के नाम और विश्व इतिहास की झलक और कुछ नहीं केवल उन पत्रों के अलग अलग संग्रह हैं जो उन्होंने जेल से इंदिरा जी को लिखे थे ।
यदि आप विश्व इतिहास की झलक पढ़ लेंगे तो नेहरू के बारे में आपकी धारणा बदल जायेगी । अपने बच्चों को यह पुस्तक अवश्य भेंट करें ।

भारत में अंग्रेज अगर राज करने में सफल हो पाये तो केवल इसलिये कि भारतवासी अपने देश के विरुद्ध लड़ने के लिये अंग्रेजों का साथ देने के लिये उनकी फ़ौज में भर्ती होने को तैयार हो गये । चीन में उन्हें एक भी चीनी ऐसा नहीं मिला जो देशद्रोह कर के उनकी सेना में भर्ती होता । इसलिये विदेशी राज के लिये हम भारतवासी ही दोषी हैं। १८५७ के विद्रोह को उन्होंने सिखों और गुरखा सैनिकों की मदद से कुचल डाला । जब हडसन कलकत्ता से विद्रोह का दमन करते हुए इलाहाबाद पहुँचा तो इलाहाबाद शहर महीनों से विद्रोहियों के कब्जे में था किंतु इलाहाबाद क़िले पर फिरंगी झंडा लहरा रहा था और सिख रेजीमेंट दुर्ग की रक्षा कर रही थी ।

मैंने अपने एक सिख मित्र को ताना मारा कि यदि १८५७ में सिखों ने विद्रोह का साथ दिया होता तो देश बहुत पहले आज़ाद हो जाता । उसका उत्तर मार्मिक था कि विद्रोह मुगल बादशाह के नेतृत्व में हो रहा था , मुगलों ने हमारे दो दो गुरुओं को शहीद कर दिया , हम उनका साथ कैसे दे सकते थे ?
ख़ैर १८५८ में भारत सीधे ब्रिटिश क्राउन के अधीन हो गया । अंग्रेजों ने स्थानीय समर्थन प्राप्त करने के उद्देश्य से १८८५ में इंडियन नेशनल काँग्रेस का गठन किया , कुछ ही वर्षों में मुस्लिम लीग और हिंदू महासभा का भी गठन हुआ । इन सभी संस्थाओं को क्राउन के प्रति अपनी निष्ठा का प्रदर्शन करना ही होता था तभी वह अपनी गतिविधियाँ जारी रख सकती थीं । सावरकर को दोहरा कालापानी मिला था और अंततः वह अंग्रेजों के प्रति वफादारी के आश्वासन पर ही रिहा हुए थे । अंग्रेजों के प्रति स्वामिभक्ति देश में रहने की पहली शर्त थी । यह सामान्य बात थी । हर शहर में रायबहादुर , ख़ानबहादुर भरे हुए थे ।

अंग्रेज छोटे मोटे विद्रोह को कितनी बेदर्दी से कुचलते थे इसका उदाहरण जलियाँवाला बाग था जहाँ अंग्रेजों ने गुरखा सैनिकों द्वारा गोलियाँ बरसवाई थीं । जलियाँवाला कांड के बाद बिस्मिल , आज़ाद, भगतसिंह आदि अनेक क्रांतिकारियों का स्वाभिमान जाग उठा लेकिन आजादी इन चिंगारियों से नहीं आ सकती थी । उसके लिये तूफ़ान की आवश्यकता थी जो गाँधी की मुट्ठी में था । वही थे जिनकी राष्ट्रव्यापी स्वीकार्यता थी । बादशाह खान से लेकर राजा जी तक उनके अनुयायी थे ।
नेहरू पर चर्चा जारी रहेगी फिलहाल आप मेरी एक कविता झेलिये। वर्षों पहले काकोरी शहीदों की स्मृति में कुछ तुकबंदी की थी । कुछ याद रही कुछ भूल गया । न हिंदी है न उर्दू , अपने हिंदुस्तान की तरह खिचड़ी भाषा में लिखी है । आज मन हुआ तो आप के साथ साझा कर रहा हूँ।
सुर्ख था सब्ज़ा चमन वीरान था ।
जलियाँवाला बाग़ इक शमशान था ।
थीं अभी ताज़ी ज़हन में पस्तियाँ ।
ग़दर की उजड़ी हुई वो बस्तियाँ !
मुद्दतें गुज़रीं कि देहली हो चुकी ।
कल का मेहमाँ आज का सुल्तान था ।
यौमे आज़ादी का सपना दूर था ।
ज़र्द चेहरों पर फ़कत अपमान था 
ऐसी तारीक़ी में कुछ चिंगारियाँ ।
दिल में जिनके आग का तूफ़ान था ।
छा गये वो इंक़लाबी इस तरह ।
उनकी हिम्मत पर फ़लक हैरान था।
कोई उम्मीदे फ़तहयाबी न थी ।
सिर्फ मर मिटने का इक अरमान था ।
था कोई अशफ़ाक़ कोई राम था ।
कोई रौशन था कोई गुमनाम था ।
चूम कर फ़ंदा खुशी से चढ़ गये।
रह गया पीछे वतन वह बढ़ गये ।
कौन थे क्या दीन था किसको ख़बर ।
उनका साझा मुल्क हिंदुस्तान था ।
राजकमल गोस्वामी

जवाहर लाल नेहरू भाग 1

आज़ादी से पूर्व और बाद की कम से कम दो पीढ़ियाँ नेहरू की दीवानी थीं । जब वह सड़कों से निकलते थे तो पुलिस छत पर से फूल बरसाने वालों पर रोक लगाती थी कि नेहरू जी को फूलों से चोट लगती है । लोग कहते हैं कि सुभाष होते तो नेहरू पीछे छूट जाते । अगर सुभाष लौट भी आते तो भी थोड़े दिन में ही उनकी आभा जवाहर के आगे फीकी पड़ जाती ।

आक्षेप यह भी लगाया जाता है कि काँग्रेस ने पटेल को प्रधानमंत्री के लिये नामित किया था किंतु गाँधी जी ने विशेषाधिकार का प्रयोग कर प्रधानमंत्री बनवाया । पटेल ने इसकी पुष्टि करते हुए कहा था कि हाँ काँग्रेस मुझे चाहती थी किंतु देश जवाहर लाल को ही प्रधानमंत्री देखना चाहता था ।

आज ही के दिन नेहरू जी का देहान्त हुआ था । चीन युद्ध की पराजय के बाद उनकी लोकप्रियता में कमी आ गई थी । मैं छोटा था छत पर से मैंने एक आदमी को भागते हुए देखा वह चीख रहा था कि नेहरू जी नहीं रहे । पुलिस ने उसको पकड़ कर दो डंडे लगाये अफ़वीह फैलाने के जुर्म में । मगर थोड़ी ही देर में यह खबर जंगल में आग की तरह फैल गई । हमारे घर में रेडियो था , छोटा सा कस्बा था धानेपुर , ज़रा सी देर में सैकड़ों आदमी रेडियो के गिर्द इकट्ठे हो गये । कुछ लोग खुश भी थे जिन्होंने नारा लगाया ," शेख़ की शेख़ी नहीं चलेगी चाचा नेहरू चले गये " 
पिता जी उस पीढ़ी के थे जो जवाहर लाल पर निसार थी । नेहरू जी का अस्थि कलश विसर्जन के लिये इलाहाबाद लाया गया । पिता जी पूरे परिवार के साथ इलाहाबाद गये । हमने आनंद भवन में कलश के दर्शन किये । वहीं से कलश की यात्रा संगम के लिये शुरू हुई । अस्थि कलश के साथ इंदिरा जी बैठीं थी , राजीव और संजय भी उसी वाहन में थे । काफिले में दलाई लामा और शेख अब्दुल्ला भी थे । शेख की लम्बाई कुछ ज़्यादा ही थी कि कार में उन्हें झुक कर बैठना पड़ रहा था ।
आज जवाहर लाल के चरित्र हनन की जितनी कोशिशें हो रही है उस युग में इससे भी अधिक होती थीं । यह उनकी लोकप्रियता ही है आज भी आलोचक और विरोधी उनके ख़ानदान का शजरा खोज रहे हैं । मगर वह इस मौलिक तथ्य से अनभिज्ञ हैं कि लोग अपने प्रेमपात्रों के अवगुणों से भी प्रेम करने लगते हैं ।
उनकी पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रद्धाँजलि !!
राजकमल गोस्वामी

ज्योतिष

मेरे अधीनस्थ एक सज्जन थे । दूसरे शहर से आते थे । एक दिन मैंने यूँ ही उनसे कहा कि तुम बक्सा बंद करके , ताला लगा कर बड़ी मेहनत से बक्सा उठा कर उसका मुँह दीवार की तरफ कर के रख कर आते हो , इससे तुम्हें क्या लाभ है ? वह सज्जन घबरा गये और फौरन बाहर जा कर घर पर फोन कर के बक्से को ही अपने घर से हटवा कर दूसरी सुरक्षित जगह पहुँचा दिया ।
एक बार सुबह सुबह उनका फोन आया कि आज दफ्तर नहीं आ पाऊँगा किसी शादी में जाना है । मैंने उन्हें परामर्श दिया कि भोजन कर के निकलना अन्यथा आज आपके भाग्य में भोजन नहीं है । वह बोले सर दिन की शादी है और लंच की व्यवस्था हैं । मैंने उन्हें शाम को फोन करने को कहा । शाम को उनका फोन आया कि गाड़ी रास्ते में खराब हो गई पहुंचते पहुँचते शाम हो गई और भोजन समाप्त हो चुका था ।

जब तक वह मेरे साथ रहे मैं उन पर प्रयोग करता रहा । एक बार तो मैंने उनसे उनकी दाहिनी जेब में रखे पाँच हजार रुपये माँग लिये कि मुझे जरूरत है । और उनकी दाहिनी जेब में कुल पाँच हजार रुपये ही निकले ।


ज्योतिष की कोई गणित इन घटनाओं की व्याख्या नहीं कर सकती । यह विशुद्ध आभासीय चेतना है जो स्वयं विकसित होती है । आइये अब ज्योतिष पर आते हैं ।ज्योतिष छह वेदांगों में से एक है । वेदों का अभिन्न अंग है । भारतीय खगोल शास्त्र बहुत पहले विकसित हो गया था । गणितीय आंकलन से सूर्य चंद्र ग्रहण की भविष्यवाणी हज़ारों वर्ष पहले शुरू हो गई थी । आर्यभट नें अपने ग्रंथ आर्यभटीयम् में ग्रहणों की वैज्ञानिक विवेचना हजार वर्ष पहले ही कर दी थी कि चंद्रमा की छाया पृथ्वी पर पड़ती है तो सूर्य ग्रहण होता है और पृथ्वी की छाया चंद्र पर पड़ती है तो चंद्र ग्रहण होता है । ॠषियों में आकाश दर्शन की परंपरा बहुत प्राचीन है । किंतु फलित ज्योतिष अत्यंत जटिल विषय है । ॠषि पाराशर का फलित ज्योतिष के नियमों के निर्धारण में बड़ा योगदान है । एक ज्योतिषी को लघु पाराशरी कंठस्थ होनी चाहिये मेरे मित्र Vijay Deo Sharma जी को कंठस्थ है । उनका बड़ा विश्वास भी है । लोग कहते हैं कि ज्योतिषी ग़लत हो सकता है मगर ज्योतिष नहीं । 

वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें तो फलित ज्योतिष का कोई आधार नज़र नहीं आता । राशिमंडल की सबसे शक्तिशाली राशि सिंह का स्वामित्व सूर्य को सौंप दिया गया है और पड़ोस की राशि कर्क का स्वामी चंद्र है । फिर इन दोनों राशियों के पड़ोस की राशियों मिथुन और कन्या सूर्य के करीबी ग्रह बुध के अधीन कर दी गईं , फिर उनके पड़ोस की राशियों वृष और तुला शुक्र के अधीन इसी तरह मेष और वृश्चिक के स्वामी मंगल , धनु और मीन के स्वामी गुरु और शेष बची मकर और कुंभ का स्वामित्व शनि को सौंप दिया गया । ग्रहों का शुभ और पापी ग्रहों में वर्गीकरण किया गया । दृष्टियाँ निर्धारित की गईं । ग्रह मैत्री के सिद्धांत स्थापित किये गये । फिर राशिमंडल को सत्ताइस नक्षत्रों में विभाजन किया गया उनके स्वामी निश्चित किये गये । जन्म कुंडली में जन्म के समय के ग्रह नक्षत्रों का चक्र विकसित हुआ और उसके बाद आई विंशोत्तरी दशा । १२० वर्ष के दशाचक्र में १८ वर्ष राहु और ७ वर्ष केतु यानी २५ वर्षों की महादशा तो इन छायाग्रहों को आवंटित की गई जो वास्तव मे ग्रह हैं ही नहीं । कतिपय ज्योतिषी अष्टोत्तरी दशा के आधार पर भी फल कथन करते हैं जो १०८ वर्षों की होती है ।
गणना के आधार पर सही फलित घटित होते मैंने शायद ही कभी देखा हो । आजकल ज्योतिषी होटलों मे ११००/ लेकर कुंडली बाँचते हैं । जातक के बारे में बहुत सारी सूचना फॉर्म में पहले भरवा लेते हैं । अगर आप लिखें कि जातक बेरोजगार है या आप जातक को पुरुष के स्थान पर स्त्री लिख दें तो ज्योतिष की असलियत सामने आ जायेगी । जो लोग ज्योतिषी के पास जाते हैं उनमें अधिकांश महिलायें होती हैं जो स्वभावतः भाग्यवादी होती हैं उन्हें पुरुषार्थ पर भरोसा नहीं होता । ज्योतिषी के साथ दूसरे कमरे में एक रत्न, रुद्राक्ष, यंत्र और लोहे के छल्ले वाला भी चलता है ।
अधिकतर ज्योतिषी तुक्के मारते हैं । कुछ तुक्के तो सब पर फिट बैठते हैं जैसे आप अपने संबंधियों के लिये बहुत करते हैं मगर उसका श्रेय आपको नहीं मिलता । आप सोचते बहुत हैं । आदमी का चेहरा ही एक मनोवैज्ञानिक को बहुत कुछ बता देता है । इसमें कुछ भी ज्योतिष नहीं है । संविधान में नागरिकों के मूलभूत दायित्व भी निर्धारित किये गये हैं । लोगों का दायित्व है कि समाज में वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करें । ज्योतिष ने लोगों को एक धर्म की तरह ग्रस्त कर रखा है । लोगों में साहस नहीं है इसके विरुद्ध बोलने का । ज्योतिषियों के तुक्के लोगों के जीवन में इतने घटित हो चुके होते हैं कि उन्हें यह याद नहीं रहता कि कितने फलादेश गलत हो चुके हैं ।
राजकमल गोस्वामी