मेरे अधीनस्थ एक सज्जन थे । दूसरे शहर से आते थे । एक दिन मैंने यूँ ही उनसे कहा कि तुम बक्सा बंद करके , ताला लगा कर बड़ी मेहनत से बक्सा उठा कर उसका मुँह दीवार की तरफ कर के रख कर आते हो , इससे तुम्हें क्या लाभ है ? वह सज्जन घबरा गये और फौरन बाहर जा कर घर पर फोन कर के बक्से को ही अपने घर से हटवा कर दूसरी सुरक्षित जगह पहुँचा दिया ।
एक बार सुबह सुबह उनका फोन आया कि आज दफ्तर नहीं आ पाऊँगा किसी शादी में जाना है । मैंने उन्हें परामर्श दिया कि भोजन कर के निकलना अन्यथा आज आपके भाग्य में भोजन नहीं है । वह बोले सर दिन की शादी है और लंच की व्यवस्था हैं । मैंने उन्हें शाम को फोन करने को कहा । शाम को उनका फोन आया कि गाड़ी रास्ते में खराब हो गई पहुंचते पहुँचते शाम हो गई और भोजन समाप्त हो चुका था ।
जब तक वह मेरे साथ रहे मैं उन पर प्रयोग करता रहा । एक बार तो मैंने उनसे उनकी दाहिनी जेब में रखे पाँच हजार रुपये माँग लिये कि मुझे जरूरत है । और उनकी दाहिनी जेब में कुल पाँच हजार रुपये ही निकले ।
ज्योतिष की कोई गणित इन घटनाओं की व्याख्या नहीं कर सकती । यह विशुद्ध आभासीय चेतना है जो स्वयं विकसित होती है । आइये अब ज्योतिष पर आते हैं ।ज्योतिष छह वेदांगों में से एक है । वेदों का अभिन्न अंग है । भारतीय खगोल शास्त्र बहुत पहले विकसित हो गया था । गणितीय आंकलन से सूर्य चंद्र ग्रहण की भविष्यवाणी हज़ारों वर्ष पहले शुरू हो गई थी । आर्यभट नें अपने ग्रंथ आर्यभटीयम् में ग्रहणों की वैज्ञानिक विवेचना हजार वर्ष पहले ही कर दी थी कि चंद्रमा की छाया पृथ्वी पर पड़ती है तो सूर्य ग्रहण होता है और पृथ्वी की छाया चंद्र पर पड़ती है तो चंद्र ग्रहण होता है । ॠषियों में आकाश दर्शन की परंपरा बहुत प्राचीन है । किंतु फलित ज्योतिष अत्यंत जटिल विषय है । ॠषि पाराशर का फलित ज्योतिष के नियमों के निर्धारण में बड़ा योगदान है । एक ज्योतिषी को लघु पाराशरी कंठस्थ होनी चाहिये मेरे मित्र Vijay Deo Sharma जी को कंठस्थ है । उनका बड़ा विश्वास भी है । लोग कहते हैं कि ज्योतिषी ग़लत हो सकता है मगर ज्योतिष नहीं ।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें तो फलित ज्योतिष का कोई आधार नज़र नहीं आता । राशिमंडल की सबसे शक्तिशाली राशि सिंह का स्वामित्व सूर्य को सौंप दिया गया है और पड़ोस की राशि कर्क का स्वामी चंद्र है । फिर इन दोनों राशियों के पड़ोस की राशियों मिथुन और कन्या सूर्य के करीबी ग्रह बुध के अधीन कर दी गईं , फिर उनके पड़ोस की राशियों वृष और तुला शुक्र के अधीन इसी तरह मेष और वृश्चिक के स्वामी मंगल , धनु और मीन के स्वामी गुरु और शेष बची मकर और कुंभ का स्वामित्व शनि को सौंप दिया गया । ग्रहों का शुभ और पापी ग्रहों में वर्गीकरण किया गया । दृष्टियाँ निर्धारित की गईं । ग्रह मैत्री के सिद्धांत स्थापित किये गये । फिर राशिमंडल को सत्ताइस नक्षत्रों में विभाजन किया गया उनके स्वामी निश्चित किये गये । जन्म कुंडली में जन्म के समय के ग्रह नक्षत्रों का चक्र विकसित हुआ और उसके बाद आई विंशोत्तरी दशा । १२० वर्ष के दशाचक्र में १८ वर्ष राहु और ७ वर्ष केतु यानी २५ वर्षों की महादशा तो इन छायाग्रहों को आवंटित की गई जो वास्तव मे ग्रह हैं ही नहीं । कतिपय ज्योतिषी अष्टोत्तरी दशा के आधार पर भी फल कथन करते हैं जो १०८ वर्षों की होती है ।
गणना के आधार पर सही फलित घटित होते मैंने शायद ही कभी देखा हो । आजकल ज्योतिषी होटलों मे ११००/ लेकर कुंडली बाँचते हैं । जातक के बारे में बहुत सारी सूचना फॉर्म में पहले भरवा लेते हैं । अगर आप लिखें कि जातक बेरोजगार है या आप जातक को पुरुष के स्थान पर स्त्री लिख दें तो ज्योतिष की असलियत सामने आ जायेगी । जो लोग ज्योतिषी के पास जाते हैं उनमें अधिकांश महिलायें होती हैं जो स्वभावतः भाग्यवादी होती हैं उन्हें पुरुषार्थ पर भरोसा नहीं होता । ज्योतिषी के साथ दूसरे कमरे में एक रत्न, रुद्राक्ष, यंत्र और लोहे के छल्ले वाला भी चलता है ।
अधिकतर ज्योतिषी तुक्के मारते हैं । कुछ तुक्के तो सब पर फिट बैठते हैं जैसे आप अपने संबंधियों के लिये बहुत करते हैं मगर उसका श्रेय आपको नहीं मिलता । आप सोचते बहुत हैं । आदमी का चेहरा ही एक मनोवैज्ञानिक को बहुत कुछ बता देता है । इसमें कुछ भी ज्योतिष नहीं है । संविधान में नागरिकों के मूलभूत दायित्व भी निर्धारित किये गये हैं । लोगों का दायित्व है कि समाज में वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करें । ज्योतिष ने लोगों को एक धर्म की तरह ग्रस्त कर रखा है । लोगों में साहस नहीं है इसके विरुद्ध बोलने का । ज्योतिषियों के तुक्के लोगों के जीवन में इतने घटित हो चुके होते हैं कि उन्हें यह याद नहीं रहता कि कितने फलादेश गलत हो चुके हैं ।
राजकमल गोस्वामी
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