Sunday, 28 May 2017

जवाहर लाल नेहरू भाग 1

आज़ादी से पूर्व और बाद की कम से कम दो पीढ़ियाँ नेहरू की दीवानी थीं । जब वह सड़कों से निकलते थे तो पुलिस छत पर से फूल बरसाने वालों पर रोक लगाती थी कि नेहरू जी को फूलों से चोट लगती है । लोग कहते हैं कि सुभाष होते तो नेहरू पीछे छूट जाते । अगर सुभाष लौट भी आते तो भी थोड़े दिन में ही उनकी आभा जवाहर के आगे फीकी पड़ जाती ।

आक्षेप यह भी लगाया जाता है कि काँग्रेस ने पटेल को प्रधानमंत्री के लिये नामित किया था किंतु गाँधी जी ने विशेषाधिकार का प्रयोग कर प्रधानमंत्री बनवाया । पटेल ने इसकी पुष्टि करते हुए कहा था कि हाँ काँग्रेस मुझे चाहती थी किंतु देश जवाहर लाल को ही प्रधानमंत्री देखना चाहता था ।

आज ही के दिन नेहरू जी का देहान्त हुआ था । चीन युद्ध की पराजय के बाद उनकी लोकप्रियता में कमी आ गई थी । मैं छोटा था छत पर से मैंने एक आदमी को भागते हुए देखा वह चीख रहा था कि नेहरू जी नहीं रहे । पुलिस ने उसको पकड़ कर दो डंडे लगाये अफ़वीह फैलाने के जुर्म में । मगर थोड़ी ही देर में यह खबर जंगल में आग की तरह फैल गई । हमारे घर में रेडियो था , छोटा सा कस्बा था धानेपुर , ज़रा सी देर में सैकड़ों आदमी रेडियो के गिर्द इकट्ठे हो गये । कुछ लोग खुश भी थे जिन्होंने नारा लगाया ," शेख़ की शेख़ी नहीं चलेगी चाचा नेहरू चले गये " 
पिता जी उस पीढ़ी के थे जो जवाहर लाल पर निसार थी । नेहरू जी का अस्थि कलश विसर्जन के लिये इलाहाबाद लाया गया । पिता जी पूरे परिवार के साथ इलाहाबाद गये । हमने आनंद भवन में कलश के दर्शन किये । वहीं से कलश की यात्रा संगम के लिये शुरू हुई । अस्थि कलश के साथ इंदिरा जी बैठीं थी , राजीव और संजय भी उसी वाहन में थे । काफिले में दलाई लामा और शेख अब्दुल्ला भी थे । शेख की लम्बाई कुछ ज़्यादा ही थी कि कार में उन्हें झुक कर बैठना पड़ रहा था ।
आज जवाहर लाल के चरित्र हनन की जितनी कोशिशें हो रही है उस युग में इससे भी अधिक होती थीं । यह उनकी लोकप्रियता ही है आज भी आलोचक और विरोधी उनके ख़ानदान का शजरा खोज रहे हैं । मगर वह इस मौलिक तथ्य से अनभिज्ञ हैं कि लोग अपने प्रेमपात्रों के अवगुणों से भी प्रेम करने लगते हैं ।
उनकी पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रद्धाँजलि !!
राजकमल गोस्वामी

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