कल नेहरू को श्रद्धांजलि वाली पोस्ट पर कई मित्रों नें अपने अपने ढंग से विरोध जताया है । यह साबित करता है कि हम सब हार्ड लाइनर हो गये हैं और अपने पूर्वजों के योगदान को अपनी अपनी राजनैतिक विचारधाराओं से जोड़ कर देखने लगे हैं और निष्पक्ष मूल्यांकन हमारे पूर्वाग्रहों के कारण दूषित हो जा रहा है ।
नेहरू ने अपने राजनैतिक जीवन में दस साल से कुछ ही कम समय जेल में बिताया था जो सावरकर के दस वर्ष के कालापानी से थोड़ा सा कम था और गाँधी के दक्षिण अफ्रीका और भारत मे बिताये कुल जेल अवधि से तीन वर्ष अधिक था । गाँधी को तब भी आग़ा खाँ पैलेस में बहुत सुविधायें प्राप्त थीं जबकि नेहरू सामान्य राजनैतिक क़ैदी की तरह ही बंद किये गये थे ।
नेहरू के व्यक्तिगत जीवन को कलंकित करने वालों को सोचना चाहिये कि जहाँ पुत्र की चाहत में कई कई विवाह करने वाले आज भी मौजूद हैं , नेहरू एक पुत्री से ही संतुष्ट थे । जब वह विधुर हुए थे तो मात्र ४६ वर्ष के थे और सलमान खान से कहीं अधिक लोकप्रिय थे । माता पिता की अनुपस्थिति के कारण इंदिरा की शिक्षा दीक्षा भी ठीक से न हो सकी फिर भी जेल में रह कर एक पिता का दायित्व कैसे निभाया जाता है यह नेहरू से सीखना चाहिये । जेल में लिखी हुई उनकी पुस्तकें भारत एक खोज, पिता के पत्र पुत्री के नाम और विश्व इतिहास की झलक और कुछ नहीं केवल उन पत्रों के अलग अलग संग्रह हैं जो उन्होंने जेल से इंदिरा जी को लिखे थे ।
यदि आप विश्व इतिहास की झलक पढ़ लेंगे तो नेहरू के बारे में आपकी धारणा बदल जायेगी । अपने बच्चों को यह पुस्तक अवश्य भेंट करें ।
यदि आप विश्व इतिहास की झलक पढ़ लेंगे तो नेहरू के बारे में आपकी धारणा बदल जायेगी । अपने बच्चों को यह पुस्तक अवश्य भेंट करें ।
भारत में अंग्रेज अगर राज करने में सफल हो पाये तो केवल इसलिये कि भारतवासी अपने देश के विरुद्ध लड़ने के लिये अंग्रेजों का साथ देने के लिये उनकी फ़ौज में भर्ती होने को तैयार हो गये । चीन में उन्हें एक भी चीनी ऐसा नहीं मिला जो देशद्रोह कर के उनकी सेना में भर्ती होता । इसलिये विदेशी राज के लिये हम भारतवासी ही दोषी हैं। १८५७ के विद्रोह को उन्होंने सिखों और गुरखा सैनिकों की मदद से कुचल डाला । जब हडसन कलकत्ता से विद्रोह का दमन करते हुए इलाहाबाद पहुँचा तो इलाहाबाद शहर महीनों से विद्रोहियों के कब्जे में था किंतु इलाहाबाद क़िले पर फिरंगी झंडा लहरा रहा था और सिख रेजीमेंट दुर्ग की रक्षा कर रही थी ।
मैंने अपने एक सिख मित्र को ताना मारा कि यदि १८५७ में सिखों ने विद्रोह का साथ दिया होता तो देश बहुत पहले आज़ाद हो जाता । उसका उत्तर मार्मिक था कि विद्रोह मुगल बादशाह के नेतृत्व में हो रहा था , मुगलों ने हमारे दो दो गुरुओं को शहीद कर दिया , हम उनका साथ कैसे दे सकते थे ?
ख़ैर १८५८ में भारत सीधे ब्रिटिश क्राउन के अधीन हो गया । अंग्रेजों ने स्थानीय समर्थन प्राप्त करने के उद्देश्य से १८८५ में इंडियन नेशनल काँग्रेस का गठन किया , कुछ ही वर्षों में मुस्लिम लीग और हिंदू महासभा का भी गठन हुआ । इन सभी संस्थाओं को क्राउन के प्रति अपनी निष्ठा का प्रदर्शन करना ही होता था तभी वह अपनी गतिविधियाँ जारी रख सकती थीं । सावरकर को दोहरा कालापानी मिला था और अंततः वह अंग्रेजों के प्रति वफादारी के आश्वासन पर ही रिहा हुए थे । अंग्रेजों के प्रति स्वामिभक्ति देश में रहने की पहली शर्त थी । यह सामान्य बात थी । हर शहर में रायबहादुर , ख़ानबहादुर भरे हुए थे ।
अंग्रेज छोटे मोटे विद्रोह को कितनी बेदर्दी से कुचलते थे इसका उदाहरण जलियाँवाला बाग था जहाँ अंग्रेजों ने गुरखा सैनिकों द्वारा गोलियाँ बरसवाई थीं । जलियाँवाला कांड के बाद बिस्मिल , आज़ाद, भगतसिंह आदि अनेक क्रांतिकारियों का स्वाभिमान जाग उठा लेकिन आजादी इन चिंगारियों से नहीं आ सकती थी । उसके लिये तूफ़ान की आवश्यकता थी जो गाँधी की मुट्ठी में था । वही थे जिनकी राष्ट्रव्यापी स्वीकार्यता थी । बादशाह खान से लेकर राजा जी तक उनके अनुयायी थे ।
नेहरू पर चर्चा जारी रहेगी फिलहाल आप मेरी एक कविता झेलिये। वर्षों पहले काकोरी शहीदों की स्मृति में कुछ तुकबंदी की थी । कुछ याद रही कुछ भूल गया । न हिंदी है न उर्दू , अपने हिंदुस्तान की तरह खिचड़ी भाषा में लिखी है । आज मन हुआ तो आप के साथ साझा कर रहा हूँ।
सुर्ख था सब्ज़ा चमन वीरान था ।
जलियाँवाला बाग़ इक शमशान था ।
जलियाँवाला बाग़ इक शमशान था ।
थीं अभी ताज़ी ज़हन में पस्तियाँ ।
ग़दर की उजड़ी हुई वो बस्तियाँ !
ग़दर की उजड़ी हुई वो बस्तियाँ !
मुद्दतें गुज़रीं कि देहली हो चुकी ।
कल का मेहमाँ आज का सुल्तान था ।
कल का मेहमाँ आज का सुल्तान था ।
यौमे आज़ादी का सपना दूर था ।
ज़र्द चेहरों पर फ़कत अपमान था
ज़र्द चेहरों पर फ़कत अपमान था
ऐसी तारीक़ी में कुछ चिंगारियाँ ।
दिल में जिनके आग का तूफ़ान था ।
दिल में जिनके आग का तूफ़ान था ।
छा गये वो इंक़लाबी इस तरह ।
उनकी हिम्मत पर फ़लक हैरान था।
उनकी हिम्मत पर फ़लक हैरान था।
कोई उम्मीदे फ़तहयाबी न थी ।
सिर्फ मर मिटने का इक अरमान था ।
सिर्फ मर मिटने का इक अरमान था ।
था कोई अशफ़ाक़ कोई राम था ।
कोई रौशन था कोई गुमनाम था ।
कोई रौशन था कोई गुमनाम था ।
चूम कर फ़ंदा खुशी से चढ़ गये।
रह गया पीछे वतन वह बढ़ गये ।
रह गया पीछे वतन वह बढ़ गये ।
कौन थे क्या दीन था किसको ख़बर ।
उनका साझा मुल्क हिंदुस्तान था ।
उनका साझा मुल्क हिंदुस्तान था ।
राजकमल गोस्वामी
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