Sunday, 28 May 2017

जवाहर लाल नेहरू भाग २

कल नेहरू को श्रद्धांजलि वाली पोस्ट पर कई मित्रों नें अपने अपने ढंग से विरोध जताया है । यह साबित करता है कि हम सब हार्ड लाइनर हो गये हैं और अपने पूर्वजों के योगदान को अपनी अपनी राजनैतिक विचारधाराओं से जोड़ कर देखने लगे हैं और निष्पक्ष मूल्यांकन हमारे पूर्वाग्रहों के कारण दूषित हो जा रहा है ।
नेहरू ने अपने राजनैतिक जीवन में दस साल से कुछ ही कम समय जेल में बिताया था जो सावरकर के दस वर्ष के कालापानी से थोड़ा सा कम था और गाँधी के दक्षिण अफ्रीका और भारत मे बिताये कुल जेल अवधि से तीन वर्ष अधिक था । गाँधी को तब भी आग़ा खाँ पैलेस में बहुत सुविधायें प्राप्त थीं जबकि नेहरू सामान्य राजनैतिक क़ैदी की तरह ही बंद किये गये थे ।

नेहरू के व्यक्तिगत जीवन को कलंकित करने वालों को सोचना चाहिये कि जहाँ पुत्र की चाहत में कई कई विवाह करने वाले आज भी मौजूद हैं , नेहरू एक पुत्री से ही संतुष्ट थे । जब वह विधुर हुए थे तो मात्र ४६ वर्ष के थे और सलमान खान से कहीं अधिक लोकप्रिय थे । माता पिता की अनुपस्थिति के कारण इंदिरा की शिक्षा दीक्षा भी ठीक से न हो सकी फिर भी जेल में रह कर एक पिता का दायित्व कैसे निभाया जाता है यह नेहरू से सीखना चाहिये । जेल में लिखी हुई उनकी पुस्तकें भारत एक खोज, पिता के पत्र पुत्री के नाम और विश्व इतिहास की झलक और कुछ नहीं केवल उन पत्रों के अलग अलग संग्रह हैं जो उन्होंने जेल से इंदिरा जी को लिखे थे ।
यदि आप विश्व इतिहास की झलक पढ़ लेंगे तो नेहरू के बारे में आपकी धारणा बदल जायेगी । अपने बच्चों को यह पुस्तक अवश्य भेंट करें ।

भारत में अंग्रेज अगर राज करने में सफल हो पाये तो केवल इसलिये कि भारतवासी अपने देश के विरुद्ध लड़ने के लिये अंग्रेजों का साथ देने के लिये उनकी फ़ौज में भर्ती होने को तैयार हो गये । चीन में उन्हें एक भी चीनी ऐसा नहीं मिला जो देशद्रोह कर के उनकी सेना में भर्ती होता । इसलिये विदेशी राज के लिये हम भारतवासी ही दोषी हैं। १८५७ के विद्रोह को उन्होंने सिखों और गुरखा सैनिकों की मदद से कुचल डाला । जब हडसन कलकत्ता से विद्रोह का दमन करते हुए इलाहाबाद पहुँचा तो इलाहाबाद शहर महीनों से विद्रोहियों के कब्जे में था किंतु इलाहाबाद क़िले पर फिरंगी झंडा लहरा रहा था और सिख रेजीमेंट दुर्ग की रक्षा कर रही थी ।

मैंने अपने एक सिख मित्र को ताना मारा कि यदि १८५७ में सिखों ने विद्रोह का साथ दिया होता तो देश बहुत पहले आज़ाद हो जाता । उसका उत्तर मार्मिक था कि विद्रोह मुगल बादशाह के नेतृत्व में हो रहा था , मुगलों ने हमारे दो दो गुरुओं को शहीद कर दिया , हम उनका साथ कैसे दे सकते थे ?
ख़ैर १८५८ में भारत सीधे ब्रिटिश क्राउन के अधीन हो गया । अंग्रेजों ने स्थानीय समर्थन प्राप्त करने के उद्देश्य से १८८५ में इंडियन नेशनल काँग्रेस का गठन किया , कुछ ही वर्षों में मुस्लिम लीग और हिंदू महासभा का भी गठन हुआ । इन सभी संस्थाओं को क्राउन के प्रति अपनी निष्ठा का प्रदर्शन करना ही होता था तभी वह अपनी गतिविधियाँ जारी रख सकती थीं । सावरकर को दोहरा कालापानी मिला था और अंततः वह अंग्रेजों के प्रति वफादारी के आश्वासन पर ही रिहा हुए थे । अंग्रेजों के प्रति स्वामिभक्ति देश में रहने की पहली शर्त थी । यह सामान्य बात थी । हर शहर में रायबहादुर , ख़ानबहादुर भरे हुए थे ।

अंग्रेज छोटे मोटे विद्रोह को कितनी बेदर्दी से कुचलते थे इसका उदाहरण जलियाँवाला बाग था जहाँ अंग्रेजों ने गुरखा सैनिकों द्वारा गोलियाँ बरसवाई थीं । जलियाँवाला कांड के बाद बिस्मिल , आज़ाद, भगतसिंह आदि अनेक क्रांतिकारियों का स्वाभिमान जाग उठा लेकिन आजादी इन चिंगारियों से नहीं आ सकती थी । उसके लिये तूफ़ान की आवश्यकता थी जो गाँधी की मुट्ठी में था । वही थे जिनकी राष्ट्रव्यापी स्वीकार्यता थी । बादशाह खान से लेकर राजा जी तक उनके अनुयायी थे ।
नेहरू पर चर्चा जारी रहेगी फिलहाल आप मेरी एक कविता झेलिये। वर्षों पहले काकोरी शहीदों की स्मृति में कुछ तुकबंदी की थी । कुछ याद रही कुछ भूल गया । न हिंदी है न उर्दू , अपने हिंदुस्तान की तरह खिचड़ी भाषा में लिखी है । आज मन हुआ तो आप के साथ साझा कर रहा हूँ।
सुर्ख था सब्ज़ा चमन वीरान था ।
जलियाँवाला बाग़ इक शमशान था ।
थीं अभी ताज़ी ज़हन में पस्तियाँ ।
ग़दर की उजड़ी हुई वो बस्तियाँ !
मुद्दतें गुज़रीं कि देहली हो चुकी ।
कल का मेहमाँ आज का सुल्तान था ।
यौमे आज़ादी का सपना दूर था ।
ज़र्द चेहरों पर फ़कत अपमान था 
ऐसी तारीक़ी में कुछ चिंगारियाँ ।
दिल में जिनके आग का तूफ़ान था ।
छा गये वो इंक़लाबी इस तरह ।
उनकी हिम्मत पर फ़लक हैरान था।
कोई उम्मीदे फ़तहयाबी न थी ।
सिर्फ मर मिटने का इक अरमान था ।
था कोई अशफ़ाक़ कोई राम था ।
कोई रौशन था कोई गुमनाम था ।
चूम कर फ़ंदा खुशी से चढ़ गये।
रह गया पीछे वतन वह बढ़ गये ।
कौन थे क्या दीन था किसको ख़बर ।
उनका साझा मुल्क हिंदुस्तान था ।
राजकमल गोस्वामी

जवाहर लाल नेहरू भाग 1

आज़ादी से पूर्व और बाद की कम से कम दो पीढ़ियाँ नेहरू की दीवानी थीं । जब वह सड़कों से निकलते थे तो पुलिस छत पर से फूल बरसाने वालों पर रोक लगाती थी कि नेहरू जी को फूलों से चोट लगती है । लोग कहते हैं कि सुभाष होते तो नेहरू पीछे छूट जाते । अगर सुभाष लौट भी आते तो भी थोड़े दिन में ही उनकी आभा जवाहर के आगे फीकी पड़ जाती ।

आक्षेप यह भी लगाया जाता है कि काँग्रेस ने पटेल को प्रधानमंत्री के लिये नामित किया था किंतु गाँधी जी ने विशेषाधिकार का प्रयोग कर प्रधानमंत्री बनवाया । पटेल ने इसकी पुष्टि करते हुए कहा था कि हाँ काँग्रेस मुझे चाहती थी किंतु देश जवाहर लाल को ही प्रधानमंत्री देखना चाहता था ।

आज ही के दिन नेहरू जी का देहान्त हुआ था । चीन युद्ध की पराजय के बाद उनकी लोकप्रियता में कमी आ गई थी । मैं छोटा था छत पर से मैंने एक आदमी को भागते हुए देखा वह चीख रहा था कि नेहरू जी नहीं रहे । पुलिस ने उसको पकड़ कर दो डंडे लगाये अफ़वीह फैलाने के जुर्म में । मगर थोड़ी ही देर में यह खबर जंगल में आग की तरह फैल गई । हमारे घर में रेडियो था , छोटा सा कस्बा था धानेपुर , ज़रा सी देर में सैकड़ों आदमी रेडियो के गिर्द इकट्ठे हो गये । कुछ लोग खुश भी थे जिन्होंने नारा लगाया ," शेख़ की शेख़ी नहीं चलेगी चाचा नेहरू चले गये " 
पिता जी उस पीढ़ी के थे जो जवाहर लाल पर निसार थी । नेहरू जी का अस्थि कलश विसर्जन के लिये इलाहाबाद लाया गया । पिता जी पूरे परिवार के साथ इलाहाबाद गये । हमने आनंद भवन में कलश के दर्शन किये । वहीं से कलश की यात्रा संगम के लिये शुरू हुई । अस्थि कलश के साथ इंदिरा जी बैठीं थी , राजीव और संजय भी उसी वाहन में थे । काफिले में दलाई लामा और शेख अब्दुल्ला भी थे । शेख की लम्बाई कुछ ज़्यादा ही थी कि कार में उन्हें झुक कर बैठना पड़ रहा था ।
आज जवाहर लाल के चरित्र हनन की जितनी कोशिशें हो रही है उस युग में इससे भी अधिक होती थीं । यह उनकी लोकप्रियता ही है आज भी आलोचक और विरोधी उनके ख़ानदान का शजरा खोज रहे हैं । मगर वह इस मौलिक तथ्य से अनभिज्ञ हैं कि लोग अपने प्रेमपात्रों के अवगुणों से भी प्रेम करने लगते हैं ।
उनकी पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रद्धाँजलि !!
राजकमल गोस्वामी

ज्योतिष

मेरे अधीनस्थ एक सज्जन थे । दूसरे शहर से आते थे । एक दिन मैंने यूँ ही उनसे कहा कि तुम बक्सा बंद करके , ताला लगा कर बड़ी मेहनत से बक्सा उठा कर उसका मुँह दीवार की तरफ कर के रख कर आते हो , इससे तुम्हें क्या लाभ है ? वह सज्जन घबरा गये और फौरन बाहर जा कर घर पर फोन कर के बक्से को ही अपने घर से हटवा कर दूसरी सुरक्षित जगह पहुँचा दिया ।
एक बार सुबह सुबह उनका फोन आया कि आज दफ्तर नहीं आ पाऊँगा किसी शादी में जाना है । मैंने उन्हें परामर्श दिया कि भोजन कर के निकलना अन्यथा आज आपके भाग्य में भोजन नहीं है । वह बोले सर दिन की शादी है और लंच की व्यवस्था हैं । मैंने उन्हें शाम को फोन करने को कहा । शाम को उनका फोन आया कि गाड़ी रास्ते में खराब हो गई पहुंचते पहुँचते शाम हो गई और भोजन समाप्त हो चुका था ।

जब तक वह मेरे साथ रहे मैं उन पर प्रयोग करता रहा । एक बार तो मैंने उनसे उनकी दाहिनी जेब में रखे पाँच हजार रुपये माँग लिये कि मुझे जरूरत है । और उनकी दाहिनी जेब में कुल पाँच हजार रुपये ही निकले ।


ज्योतिष की कोई गणित इन घटनाओं की व्याख्या नहीं कर सकती । यह विशुद्ध आभासीय चेतना है जो स्वयं विकसित होती है । आइये अब ज्योतिष पर आते हैं ।ज्योतिष छह वेदांगों में से एक है । वेदों का अभिन्न अंग है । भारतीय खगोल शास्त्र बहुत पहले विकसित हो गया था । गणितीय आंकलन से सूर्य चंद्र ग्रहण की भविष्यवाणी हज़ारों वर्ष पहले शुरू हो गई थी । आर्यभट नें अपने ग्रंथ आर्यभटीयम् में ग्रहणों की वैज्ञानिक विवेचना हजार वर्ष पहले ही कर दी थी कि चंद्रमा की छाया पृथ्वी पर पड़ती है तो सूर्य ग्रहण होता है और पृथ्वी की छाया चंद्र पर पड़ती है तो चंद्र ग्रहण होता है । ॠषियों में आकाश दर्शन की परंपरा बहुत प्राचीन है । किंतु फलित ज्योतिष अत्यंत जटिल विषय है । ॠषि पाराशर का फलित ज्योतिष के नियमों के निर्धारण में बड़ा योगदान है । एक ज्योतिषी को लघु पाराशरी कंठस्थ होनी चाहिये मेरे मित्र Vijay Deo Sharma जी को कंठस्थ है । उनका बड़ा विश्वास भी है । लोग कहते हैं कि ज्योतिषी ग़लत हो सकता है मगर ज्योतिष नहीं । 

वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें तो फलित ज्योतिष का कोई आधार नज़र नहीं आता । राशिमंडल की सबसे शक्तिशाली राशि सिंह का स्वामित्व सूर्य को सौंप दिया गया है और पड़ोस की राशि कर्क का स्वामी चंद्र है । फिर इन दोनों राशियों के पड़ोस की राशियों मिथुन और कन्या सूर्य के करीबी ग्रह बुध के अधीन कर दी गईं , फिर उनके पड़ोस की राशियों वृष और तुला शुक्र के अधीन इसी तरह मेष और वृश्चिक के स्वामी मंगल , धनु और मीन के स्वामी गुरु और शेष बची मकर और कुंभ का स्वामित्व शनि को सौंप दिया गया । ग्रहों का शुभ और पापी ग्रहों में वर्गीकरण किया गया । दृष्टियाँ निर्धारित की गईं । ग्रह मैत्री के सिद्धांत स्थापित किये गये । फिर राशिमंडल को सत्ताइस नक्षत्रों में विभाजन किया गया उनके स्वामी निश्चित किये गये । जन्म कुंडली में जन्म के समय के ग्रह नक्षत्रों का चक्र विकसित हुआ और उसके बाद आई विंशोत्तरी दशा । १२० वर्ष के दशाचक्र में १८ वर्ष राहु और ७ वर्ष केतु यानी २५ वर्षों की महादशा तो इन छायाग्रहों को आवंटित की गई जो वास्तव मे ग्रह हैं ही नहीं । कतिपय ज्योतिषी अष्टोत्तरी दशा के आधार पर भी फल कथन करते हैं जो १०८ वर्षों की होती है ।
गणना के आधार पर सही फलित घटित होते मैंने शायद ही कभी देखा हो । आजकल ज्योतिषी होटलों मे ११००/ लेकर कुंडली बाँचते हैं । जातक के बारे में बहुत सारी सूचना फॉर्म में पहले भरवा लेते हैं । अगर आप लिखें कि जातक बेरोजगार है या आप जातक को पुरुष के स्थान पर स्त्री लिख दें तो ज्योतिष की असलियत सामने आ जायेगी । जो लोग ज्योतिषी के पास जाते हैं उनमें अधिकांश महिलायें होती हैं जो स्वभावतः भाग्यवादी होती हैं उन्हें पुरुषार्थ पर भरोसा नहीं होता । ज्योतिषी के साथ दूसरे कमरे में एक रत्न, रुद्राक्ष, यंत्र और लोहे के छल्ले वाला भी चलता है ।
अधिकतर ज्योतिषी तुक्के मारते हैं । कुछ तुक्के तो सब पर फिट बैठते हैं जैसे आप अपने संबंधियों के लिये बहुत करते हैं मगर उसका श्रेय आपको नहीं मिलता । आप सोचते बहुत हैं । आदमी का चेहरा ही एक मनोवैज्ञानिक को बहुत कुछ बता देता है । इसमें कुछ भी ज्योतिष नहीं है । संविधान में नागरिकों के मूलभूत दायित्व भी निर्धारित किये गये हैं । लोगों का दायित्व है कि समाज में वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करें । ज्योतिष ने लोगों को एक धर्म की तरह ग्रस्त कर रखा है । लोगों में साहस नहीं है इसके विरुद्ध बोलने का । ज्योतिषियों के तुक्के लोगों के जीवन में इतने घटित हो चुके होते हैं कि उन्हें यह याद नहीं रहता कि कितने फलादेश गलत हो चुके हैं ।
राजकमल गोस्वामी